सोमवार, 16 मई 2022

क्यों भारतीय रुपए की कीमत डॉलर की तुलना में कम हो रही है?

क्यों भारतीय रुपए की कीमत डॉलर की तुलना में कम हो रही है? 

आज दिनांक 16 मई 2022 की बात करें, तो एक डॉलर की कीमत भारतीय रुपए में 77.75 रुपए हैं। जबकि मार्च 2020 के  कोविड के समय ₹70 के आसपास थी। इसी तरह से 2013 में भी यह ₹70 की ऊंचाई को छुआ था जबकि और थोड़ा पीछे और जाते हैं तो 2010 में $1 की कीमत 45 भारतीय रुपए थी। 

वर्तमान में डॉलर की कीमत रुपए की तुलना में सबसे उच्चतम स्तर पर है। इसका आशय यह है कि रुपए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर हो रहा है। रुपए की तुलना में डॉलर मजबूत हो रही है। 

आइए इसे समझते हैं। ऐसा क्यों होता है? 

भारतीय रुपए और डॉलर के बीच के संबंध को केवल भारत के परिदृश्य में नहीं बल्कि पूरे विश्व की आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य में ही देखकर समझा जा सकता हैं। 

इसे समझने के लिए सबसे पहले यूएस डॉलर करेंसी इंडेक्स को समझना सबसे जरूरी है। 

यूएस डॉलर इंडेक्स 6 अंतर्राष्ट्रीय करेंसी की एक बास्केट का यूएस डॉलर के साथ तुलना है। इन 6 मुद्रा में यूरो, जापानी येन,  स्टर्लिंग पाउंड, कैनेडियन डॉलर, स्वीडिश क्रोना एवं स्विस फ्रैंक शामिल है। 

वर्तमान में यूएस डॉलर इंडेक्स भी अपने सबसे उच्चतम स्तर पर ट्रेड कर रहा है। फिलहाल यूएस डॉलर इंडेक्स 104.54 पर ट्रेड कर रहा है। 

रूस यूक्रेन युद्ध एवं उससे उत्पन्न  ऊर्जा संकट से पहले अर्थात 2022 के मार्च में यह $102 था जबकि 2021 के अप्रैल के समय यह $100 से नीचे। जबकि 2017 के जनवरी में $103 रहा है। 

जब 2008 में अमेरिकी बाजार में सब प्राइम संकट आया था तब या अपने निम्नतम स्तर पर था  $70 के आसपास।

अगर और पुराने इतिहास की बात करें तो 2000 से 2002 के बीच में जब डॉट कॉम बबल आया था और उससे मंदी (रिसेशन) उत्तपन्न हुई, एवं उस समय यह $120 के आसपास पहुंच गया था। 

 इन डाटा का निष्कर्ष क्या है? 

अगर इतिहास से शुरू करें तो डॉट कॉम बबल जब फूटा तो कई सारे देशों में खासकर वहां की आईटी सेक्टर में काफी बिकवाली (शेयर बाजार) आई, जिससे एक रिसेशन का वातावरण बना एवं उसी समय वर्ल्ड ट्रेड सेंटर(9/11)पर भी हमला हुआ था।

उस समय यूएस डॉलर करेंसी इंडेक्स $120 के पार चला गया। यूएस डॉलर इंडेक्स का ऊपर की ओर जाना, US डॉलर की मजबूती का संकेत है। जब भी इंडेक्स ऊपर की ओर जाता है तो डॉलर की तुलना में अन्य मुद्रा कमजोर होती है।  जब अन्य करेंसी मजबूत होती है तो इंडेक्स नीचे की ओर जाता है। 

डॉट कॉम बबल के बर्स्ट होने पर दुनिया के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा, और उन अर्थव्यवस्था की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था ज्यादा मजबूत रही। इसी तरह से जब कोविड-19 आया तब भी यही स्थिति देखी गई। डॉलर मजबूत हुआ तथा  अन्य करेंसी कमजोर हुई। 

क्यों ऐसा होता है कि जब दुनिया की अन्य देशों की अर्थव्यवस्था में समस्या दिखती है तो यूएस का  डॉलर मजबूत होता है?

इसे वैश्विक राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य से समझना पड़ेगा। 

यूनाइटेड स्टेट दुनिया की सबसे शक्तिशाली एवं सबसे स्थिर देश है, जहाँ ह्यूमन राइट्स , लोकतंत्र को अधिक महत्व दिया जाता है। यह विश्व की सबसे बड़ी सैन्य एवं आर्थिक महाशक्ति है। अंतरष्ट्रीय संस्थान जैसे World bank, IMF आदि पर इनका प्रभाव अधिक है। इन कारणों से यह माना जाता है कि US किसी भी संकट का सामना अन्य देशों की तुलना में बेहतर ढंग से कर सकती है। 

इसके अलावा दुनिया में जितने भी ट्रेड होते हैं, 90%  डॉलर में ही होते है। डॉलर एक तरह से इंटरनेशनल करेंसी की तरह काम करती है।

 क्यों डॉलर इंटरनेशनल करेंसी की तरह काम करती है? तो इसका एकमात्र जवाब है कि जिस देश की इकोनॉमी सबसे स्टेबल है,सबसे बड़ी है एवं जो देश सबसे शक्तिशाली है वहां की   अर्थव्यवस्था पर लोगों का विश्वास अधिक होता है और यह माना जाता है कि यह  करेंसी है और इस देश की  इकोनामी है बुरी से बुरी परिस्थितियों में दूसरे देशों की तुलना में अधिक बेहतर और कुशलता पूर्वक कार्य करेगी इसलिए लोगों / संस्थानों का भरोसा इनकी करेंसी पर अधिक होता है। 

इसलिए कहीं भी दुनिया में संकट आती है। तो डॉलर मजबूत होता है। 

इसको एक अन्य दृष्टिकोण से  समझते हैं। 

जब जब दुनिया के अन्य देशों में संकट होता है या विश्वव्यापी संकट आता है तब फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर यानी FII किसी देश में किए गए इन्वेस्टमेंट को वह निकालने लगती है।  जब वहां पर वह बिकवाली करेगी तो उस देश से डॉलर के रूप में निवेश निकल जाएगा। जिससे उस देश मे डॉलर की कमी होगी और डॉलर की कीमत बढ़ जाएगी।

जब 2020 में कोविड संकट आया है तो पूरे विश्व के शेयर मार्केट में सेलिंग देखी गयी।  जितनी ज्यादा सेलिंग होती गई,  डॉलर ऊपर की ओर आता गया और उस देश की करेंसी का वैल्यू कम होती गयी। 

यही स्थिति 2022 के मार्च से देखी गई है जब रसिया यूक्रेन वार शुरू हुआ और इस बार  साथ-साथ एक एनर्जी क्राइसिस भी उत्पन्न हो गई क्योंकि रूस पूरे यूरोप में पेट्रोलियम गैस का सप्लाई करता है। रूस पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट पर बैन लगा देने से पेट्रोलियम प्रोडक्ट की जो डिमांड है वह तो उतनी ही रही, लेकिन सप्लाई कम हो गई जिसके कारण क्रूड ऑयल की प्राइस बढ़ गया। जब क्रूड ऑयल की प्राइस बढ़ जाती है और जो देश क्रूड ऑयल के आयात पर ज्यादा निर्भर है, उनको अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, क्रूड ऑयल खरीदने के लिए, जिसे कारण उस देश की करेंसी की कीमत डॉलर के मुकाबले कम हो जाती है और डॉलर और मजबूत हो जाता है क्योंकि क्रूड ऑयल इंटरनेशनल बाजार में डॉलर से ही खरीदी जा सकती है।

जब अन्य देशों में रसिया यूक्रेन युद्ध का काफी नकारात्मक असर पड़ा, तब अमेरिका पर असर क्यों नहीं हुआ?

 इसका  सिंपल एक कारण है कि अमेरिका अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं है, एवं वह खुद पेट्रोलियम प्रोडक्ट का निर्यात करता है तथा इसके अलावा उसके अन्य energy resources है जो उनकी ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करने के लिए काफी है। 

 अगर भारत एवं यूरोप की बात करें तो वे अपने अधिकांश पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे इंपोर्ट करना पड़ता है।  मार्च 2022  से ठीक पहले  1 बैरल क्रूड ऑयल की कीमत $60 के आसपास थी जो अब एक $100 के से अधिक हो गई। जिसके कारण यूरोप के देशों एवं भारत को अधिक डॉलर खर्च करना पड़ रहा है और भारत एवं यूरोप से डॉलर की निकासी हो रही है जिसके कारण भारत और यूरोप में उसकी करेंसी का अवमूल्यन हो रहा है और वह करेंसी डॉलर की तुलना में सस्ती होती जा रही है। 

इसके अलावा एफआईआई  किसी भी देश के शेयर मार्केट से पैसा तब निकालते हैं जब यूएस में फेडरल रिजर्व अपनी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज की इंटरेस्ट रेट बढ़ाती है फिलहाल मार्च 2022 के बाद से यूएस गवर्नमेंट सिक्योरिटी के रेट में बढ़ोत्तरी हुई है। जिसके कारण debt asset class, equity asset class की तुलना में अधिक फायदेमंद लगने लगा है। जिसके फलस्वरूप भारत एवं अन्य देशों से एफआईआई ने शेयर बाजार में बिक़वाली कर उसे यूएस इकोनॉमी के गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में डाला जा रहा है। 

एफआईआई की सेलिंग के कारण बड़ी मात्रा में भारत एवं अन्य देशों से डॉलर बाहर निकला है। 

जिसके फलस्वरूप रुपए डॉलर की तुलना में गिरा है। इसी तरह यूरो भी अपने 5 साल के निम्नतम स्तर पर है। इसका भी वही कारण है  नेचुरल गैस की supply,  रूस यूक्रेन युद्ध एवं FII की बिकवाली। 

अमेरिका को एक इस चीज का भी फायदा पहुंचता है कि अमेरिका प्राकृतिक एवं राजनीतिक रूप से शत्रुओं से सीमा नहीं लगती है।  जिसके कारण वह एक तरह से विदेशी हमलों से  सुरक्षित है। 

इसके अलावा एनर्जी पर उसकी निर्भरता दूसरे देशों में नहीं है और उसकी अर्थव्यवस्था उच्च टेक्नोलॉजी पर निर्भर है जिसका कोई प्रतिस्पर्धी फ़िलहाल नहीं है। जर्मनी भी एक high-technology आधारित अर्थव्यवस्था है परंतु उसका साइज अमेरिका की तुलना में काफी कम है। एवं high tech आधारित अमेरिकी कंपनियों का एक तरह से एकाधिकार है विश्व बाजार में। 

इन सभी चीजों को मद्देनज़र रखते हुए जब कभी वैश्विक बुरी परिस्थितिया आती है  तब लोगों एवं संस्थानों  को अपने पैसे अमेरिका के बाजार में इन्वेस्ट करना या अमेरिका की गवर्नमेंट सिक्योरिटी में इन्वेस्ट करना ज्यादा  अच्छा, फायदेमंद एवं सुरक्षित लगता है इसलिए हमेशा से जब जब कोई भी क्राइसिस आती है तो अन्य देशों की करेंसी में बिकवाली आती है और डॉलर मजबूत होता जाता है।

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