रविवार, 15 मई 2022

क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है?


भारत के संविधान के अनुसार हिंदी का उल्लेख आर्टिकल 343 में है, जिसमें यह कहा गया है  संघ (union) की ऑफिशियल लैंग्वेज अर्थात राजकाज की भाषा हिंदी होगी जो देवनागरी स्क्रिप्ट में लिखी जाएगी। 

साथ ही ऑफिशियल लैंग्वेज एक्ट 1963 के तहत हिंदी के साथ-साथ संघ के राज काज के लिए इंग्लिश को भी मान्यता दी गई है तथा केंद्र एवं अहिन्दी राज्य के बीच में कम्युनिकेशन के लिए इंग्लिश तथा हिंदी राज्यो के साथ हिंदी का प्रयोग का प्रावधान है। 

भारत के संविधान या भारत के कानून में ऐसा कहीं भी कुछ भी वर्णित नहीं है जिसमे हिंदी को पूरे राष्ट्र की भाषा के तौर पर मान्यता प्राप्त है। हिंदी केवल राजकाज की केंद्र की राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। 

साथ ही साथ प्रत्येक राज्य का अपना क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान  है जिससे वह अपना शासन कार्य उस भाषा में वह कर सकते हैं। वह भाषा हिंदी या हिंदी के अलावा अन्य भाषा हो सकती है। 

लेकिन समय-समय पर यह विवाद उठता रहता है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी को थोपा जा रहा है, या हिंदी को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है एवं  स्टॉप हिंदी इंपोजिशन जैसे कैंपेन सोशल मीडिया में चलाया जाता है। आइए देखते हैं इसमें क्या सच्चाई है? 

इस विवाद का मुख्य कारण लोगों की अज्ञानता है। उत्तर भरतीय लोग यह मानते हैं कि हिंदी पूरे देश की राष्ट्रभाषा है और सबको हिंदी आनी चाहिए। 

इसके अलावा दक्षिण भारत में खासकर तमिलनाडु में लोगों को यह भ्रम है कि हिंदी से तमिल भाषा का अस्तित्व और प्रयोग खतरे में पड़ जाएगी तथा उसकी भाषा की संस्कृति को नुकसान पहुंचेगा। 

उत्तर भारतीय लोगो का एक तर्क यह भी है कि उनकी भी मातृभाषा हिंदी नहीं है, किसी की अवधी है तो किसी की राजस्थानी, तो किसी की भोजपूरी तो किसी की अन्य कोई भाषा है, पर वो सभी हिंदी में एक दूसरे से बातचीत करते है। 
जब हिंदी का विरोध करने वाले और हिंदी का पुरजोर समर्थन करने वाले लोग कट्टर रुख अपनाते, तब विवाद उत्पन्न होता है। 

भारत एक बहुभाषी क्षेत्र है जहां पर हर 100 किलोमीटर में भाषा बदल जाती है। तो हमें हमेशा एक लिंक भाषा की जरूरत पड़ती है जिससे हम एक दूसरे से बात कर पाए, लेकिन वह भाषा क्या होनी चाहिए?

कुछ लोग यह मानते हैं कि लिंक भाषा हिंदी होनी चाहिए क्योंकि हिंदी सबसे अधिक क्षेत्रों में, सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। इसके अलावा कुछ लोग यह मानते हैं कि इंग्लिश होनी चाहिए ताकि किसी भारतीय भाषा का दूसरी भाषा पर प्रभुत्व ना हो। 

अगर भारत की वस्तुस्थिति देखी जाए तो दो भिन्न मातृभाषा वाले लगभग 70% लोगों द्वारा हिंदी का ही प्रयोग होता है तथा 10% से कम लोगो के द्वारा इंग्लिश का प्रयोग होता है। 
हिंदी से क्या फायदा और क्या नुकसान हो सकता है, इसे समझते हैं? 

हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।  हिंदी फिल्मों ने इसका प्रचार पूरे भारत में कर दिया है जिसके कारण अन्य भाषा के लोग भी हिंदी को समझने लगे हैं तथा बोलने भी लगे हैं एवं दो भिन्न भाषा वाले लोगो में कम्युनिकेशन के रूप में हिंदी का ही प्रयोग हो रहा है। 

हमें एक दूसरे से कम्युनिकेशन के लिए एक भाषा चाहिए जो फिलहाल भारत में हिंदी निभा रही है। 
एक लिंक लैंग्वेज नहीं होने पर कई सारी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है, रोजगार एवं आजीविका से इसका सीधा संबंध है। कम्युनिकेशन गैप की वजह से कई बार निर्दोष लोगों की हत्या तक हो जाती है। 

लेकिन क्या भारत में लिंक लैंग्वेज के रूप में  इंग्लिश का प्रयोग कर सकते है?

भारत में केवल 2% लोग ही हैं, इंग्लिश बोल पाते है। जिसके कारण कम्युनिकेशन में समस्या हो सकती है। हिंदी एवं अन्य उत्तर भारतीय भाषा की उत्तपत्ति संस्कृत से हुई है, जिस कारण हिंदी के  शब्द अन्य क्षेत्रीय भाषा जैसे गुजराती बांग्ला,असमिया आदि से काफी मिलते-जुलते हैं एवं बहुत सारे शब्द समान ही होते है। जिससे एक गुजराती को हिंदी सीखना ज्यादा आसान पड़ता है, उसी तरह से एक हिंदी भाषी के लिए गुजराती या मराठी सीखना कठिन नहीं है,  इसी तरह से एक बांग्ला या असमिया को हिंदी समझना एवं बोलना ज्यादा आसान पड़ता है,  इंग्लिश की तुलना में।  द्रविड़ भाषा समूह के भी बहुत सारे शब्द संस्कृत से लिए गए हैं। 

हिंदी पूरी तरह से भारतीय भाषा है लेकिन अंग्रेजों के 200 साल के शासन काल के कारण  इंग्लिश का प्रयोग भारत में  है साथ ही पूरे दुनिया में एक लिंक भाषा के रूप में इंग्लिश का प्रयोग किया जाता है। भारत में अधिकांश सरकारी काम, कोर्ट का काम भी इंग्लिश में होता है। इस कारण भारत में एक बड़ा समूह यह मानता है कि इंग्लिश को  लिंक भाषा के रूप में प्रयोग करना चाहिए। 

लेकिन हिंदी भाषा का एक बहुत बड़ा बाजार है। हिंदी भाषा के न्यूज़ चैनल, हिंदी भाषा के यूट्यूब वीडियो की पहुँच काफी अधिक होते हैं इंग्लिश भाषा की तुलना में। अगर भारत की बात की जाए तो तमिल भाषा की यूट्यूब वीडियो या इंग्लिश भाषा की यूट्यूब वीडियो की तुलना में  हिंदी भाषा की वीडियो की reach  अधिक होती है। जो जितना हिंदी से दूर होता है उसकी अपॉर्चुनिटी अन्य हिंदी जानने वालों लोगों की तुलना में कम हो जाती है। 

इसी तरह से कोई हिंदी भाषी अगर दक्षिण भारत के राज्य है या दूसरे अन्य हिंदीभाषी क्षेत्र में रह रहा है और वह उस क्षेत्रीय भाषा को नहीं जानता है तो उसके लिए भी समस्या रहती है। उसके लिए भी अपॉर्चुनिटी कम हो जाती है। 

इसका सबसे बड़ा सॉल्यूशन यह है कि भाषा लोगो को अपने जरूरत के अनुसार  सीखना एवं बोलना चाहिए। 

अगर कोई गैर तमिल तमिलनाडु सैलानी के तौर पर जाता है और वहां के लोग अगर ठीक से उससे communicate नहीं कर पाएंगे उसका अनुभव वह के टूरिज्म के प्रति खराब होगा जिससे वहाँ टूरिस्ट आना कम हो जाएंगे, अंतत उस राज्य को ही नुकसान होगा। यही बात दूसरे राज्य में भी कही जा सकती है। 

इसलिए! सबसे बेहतर या है कि आप जितनी अधिक भाषाओं को जाने उतना आपके लिए बेहतर है। भाषा सिखाने में जबरदस्ती नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को स्वेच्छा से अपनी जरूरत के हिसाब से भाषा सीखना चाहिए। जो जितनी अधिक भाषाएं जानेगा उतना  फायदे की स्थिति में रहेगा।

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