रविवार, 29 मई 2022

इतनी महंगाई क्यों है?

 इतनी महंगाई क्यों है? 

साधारण शब्दों में कहें तो सप्लाई और डिमांड का मिसमैच के कारण महंगाई होती है। अर्थात जब डिमांड अधिक हो और  वस्तुओं की सप्लाई कम हो तो महंगाई होती है। 

महंगाई के बहुत सारे कारण होते हैं। घरेलू कारण, वैश्विक कारण तथा तात्कालिक कारण। 

आइए देखते हैं इसके क्या-क्या कारण फिलहाल नजर आते हैं। फिलहाल तात्कालिक कारण की बात करें तो रसिया यूक्रेन वार के  कारण रसिया से पेट्रोलियम प्रोडक्ट की खरीद बहुत सारे देशों ने बंद कर दिया। जिस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में  पेट्रोलियम प्रोडक्ट की सप्लाई कम हो गई है जबकि मांग उतनी ही है, जिससे पेट्रोलियम प्रोडक्ट के दाम बढ़ गया। इसी तरह से यूक्रेन जो  गेहूं और सूरजमुखी के तेल का  बड़ा उत्पादक देश है वहां से इस युद्ध के कारण सूर्यमुखी का तेल और गेहूं की सप्लाई नहीं हो पा रही है जिस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं और खाद्य तेल की कमी हो गई है। 

कोविड-19 के बाद united state ने बड़ी मात्रा में डॉलर की प्रिंटिंग की और stimulus package के रूप में US मार्केट में डॉलर की सप्लाई बढ़ाई। चूंकि   डॉलर अंतरास्ट्रीय मुद्रा की तरह कार्य करती है जिसकारण उत्पादित वस्तुओं की तुलना में डॉलर की सप्लाई अधिक हो जाने के कारण वस्तुओं का मूल्य बढ़ गया, जिसका असर अभी भी दिख रहा है। डॉलर जनित महंगाई तब समाप्त होगी जब विश्व में मौजूद डॉलर की तुलना में या करेंसी की तुलना में वस्तुओं की सप्लाई होगी। 

कोविड-19 के कारण  खासकर चीन में सप्लाई चेन  काफी डिस्टर्ब हुई, चूंकि चीन विश्व का फेक्टरी है इसलिए बहुत सारे देशो में कई वस्तुओं की कमी हो गई। भारत की बात करें तो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में प्रयोग किए जाने वाले चिप की कमी हो जाने के कारण कार,कंप्यूटर  जैसी वस्तुओं के दाम बढ़ गए। 

इसके अलावा पिछले दो सालो से काफी गर्मी पड़ी है जिससे गेहूं तथा अन्य फसलों का उत्पादन में कमी आई है। जिसकारण खाद्य पदार्थो की कीमत बढ़ी है।

अगर भारत की बात की जाए तो भारत में महंगाई के कारण वैश्विक कारण से मिलते जुलते  तथा कुछ अलग है। भारत की पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर दूसरे देशों पर निर्भरता अधिक है जिसे कारण उसको अधिक कीमत पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने पड़ते हैं। इसके महँगे होने से हर वस्तुओं की आवागमन महँगा हो जाता है, जिससे भारत में महंगाई बढ़ जाती है। 

भारत में कोविड 19 के मंदी के समय से ही इंटरेस्ट रेट काफी कम किया गया है ताकि लोग अधिक से अधिक वस्तुओं को खरीद सके और GDP में वृद्धि हो। इससे जीडीपी वृद्धि दर में तेजी तो आई साथ ही महंगाई भी बढ़ी।

यह तो हो गई महंगाई के बात, लेकिन इसका समाधान किया है?

अगर भारत की बात की जाए तो भारत को  पेट्रोलियम प्रोडक्ट के आयात को कम करना होगा और यह कम तभी की जा सकती है, जब भारत अधिक से अधिक रिन्यूएबल एनर्जी से अपनी ऊर्जा जरूरतों को  पूरा करे। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत विश्व बाजार से निर्धारित होती है जिसकी कीमत में काफी उतार चढ़ाव रहता है।

भारत में की खाद्य तेल का उत्पादन काफी कम है जिसके कारण हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात करना पड़ता है। लेकिन  किसी भी एक खाद्य तेल उत्पादक देश में समस्या होने पर पूरे विश्व में खाद्य तेल की कीमत बढ़ जाती है जिसके कारण खाद्य तेल महंगा  हो जाता है और इसका बोझ प्रत्येक भारतीयों को सहना पड़ता है।खाद्य तेलों में आत्मनिर्भता ही एकमात्र समाधान है।

भारत में ट्रेड डिफिसिट (व्यापार घाटा)  के कारण डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत कम है, जिसके आयात महंगा पड़ता है। जिससे भारत में पेट्रोलियम पदार्थ समेत अन्य आयातित वस्तुओं की कीमत अन्य देशों की तुलना में काफी महँगी रहती है। भारत को आयातित वस्तुओं को चिन्हित कर उन सभी वस्तुओ को भारत में ही उत्पादन करने की कोशिश होनी चाहिए। देशी तथा विदेशी, दोनों प्रकार के निवेश को आकर्षित करने के लिये आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

भारत को फिलहाल और व्याज दर बढ़ाना होगा। व्याज दर अगर बढ़ाया जाएगा तो मार्केट से पैसे कम हो जाएंगे, जिससे लोगों की परचेसिंग पावर कम हो जाएगी। और  कुछ हद तक महंगाई पर तात्कालिक स्तर पर लगाम लग सकती है।

इसके अलावा भारत में खाद्य विविधता (फूड डाइवर्सिटी) की काफी जरूरत है। किसी एक फूड पर अधिक निर्भरता एवं उसकी उत्पादकता की अनिश्चितता से महंगाई काफी बढ़ सकती है। अतः गेहूं - चावल के साथ-साथ अगर हम ज्वार-बाजरा, जौ, रागी जैसे अन्य खाद्यानों का उपयोग करें तो महंगाई को  कम किया जा सकता है। क्योंकि इस तरह की  फसल जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा सहनशील है।

आइए देखते हैं कि दुनिया में किस तरह से महंगाई पर लगाम लगाया जा सकता है। 

सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि पेट्रोलियम प्रोडक्ट की एक सामान मात्रा में सप्लाई  या जरूरत के अनुसार सप्लाई हमेशा बनी रहे। जिससे किसी एक देश की सप्लाई डिस्टर्ब होने पर पूरे विश्व पर उसका असर ना पड़े। पेट्रोलियम पदार्थ के महंगे होने का असर केवल एक देश पर नहीं बल्कि पूरे विश्व की GDP पर पड़ता है। अतः अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी एक देश की सप्लाई अगर कम हो गई तो दूसरे देश अधिक उत्पादन कर डिमांड के अनुसार पेट्रोलियम पदार्थ की सप्लाई को बरकरार रखें।

युद्ध जितनी जल्दी हो सके, खत्म किया जाना चाहिए। युद्ध से फायदा तो कुछ नहीं है, केवल नुकसान ही है। युद्ध में सम्मिलित देश के लोगों का सीधा नुकसान है तथा विश्व के अन्य लोगों पर बढ़ती महंगाई के रूप में नुकसान पहुंचाती है।

Climate change के कारण भी हमारी खाद्य उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। समुद्र तटीय इलाके में समुद्र का खारा पानी भर जाने से उत्पादक क्षेत्र बंजर होता जा रहा है। ग्लेशियर के पिघलने से बाढ़ जैसी समस्याओं के कारण मैदानी क्षेत्र में भी उत्पादन पर असर पड़ा है। अधिक गर्मी से गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन 20% तक घट गया है। 

इसके अलावा  यह भी  कोशिश करनी चाहिए कि सप्लाई चैन हमेशा सही ढंग से काम करें। किसी एक देश पर अधिक निर्भरता के कारण सप्लाई चेन पूरे विश्व की डिस्टर्ब हो सकती है। चीन में कोविड-19 के लॉक डाउन से पूरे विश्व की सप्लाई चेन टूट गई थी  क्योंकि पूरा विश्व चीन के उत्पादित वस्तुओं का खरीददार  है। चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने ले लिये अन्य देशों में भी निवेश को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। 



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