रविवार, 29 मई 2022

इतनी महंगाई क्यों है?

 इतनी महंगाई क्यों है? 

साधारण शब्दों में कहें तो सप्लाई और डिमांड का मिसमैच के कारण महंगाई होती है। अर्थात जब डिमांड अधिक हो और  वस्तुओं की सप्लाई कम हो तो महंगाई होती है। 

महंगाई के बहुत सारे कारण होते हैं। घरेलू कारण, वैश्विक कारण तथा तात्कालिक कारण। 

आइए देखते हैं इसके क्या-क्या कारण फिलहाल नजर आते हैं। फिलहाल तात्कालिक कारण की बात करें तो रसिया यूक्रेन वार के  कारण रसिया से पेट्रोलियम प्रोडक्ट की खरीद बहुत सारे देशों ने बंद कर दिया। जिस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में  पेट्रोलियम प्रोडक्ट की सप्लाई कम हो गई है जबकि मांग उतनी ही है, जिससे पेट्रोलियम प्रोडक्ट के दाम बढ़ गया। इसी तरह से यूक्रेन जो  गेहूं और सूरजमुखी के तेल का  बड़ा उत्पादक देश है वहां से इस युद्ध के कारण सूर्यमुखी का तेल और गेहूं की सप्लाई नहीं हो पा रही है जिस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं और खाद्य तेल की कमी हो गई है। 

कोविड-19 के बाद united state ने बड़ी मात्रा में डॉलर की प्रिंटिंग की और stimulus package के रूप में US मार्केट में डॉलर की सप्लाई बढ़ाई। चूंकि   डॉलर अंतरास्ट्रीय मुद्रा की तरह कार्य करती है जिसकारण उत्पादित वस्तुओं की तुलना में डॉलर की सप्लाई अधिक हो जाने के कारण वस्तुओं का मूल्य बढ़ गया, जिसका असर अभी भी दिख रहा है। डॉलर जनित महंगाई तब समाप्त होगी जब विश्व में मौजूद डॉलर की तुलना में या करेंसी की तुलना में वस्तुओं की सप्लाई होगी। 

कोविड-19 के कारण  खासकर चीन में सप्लाई चेन  काफी डिस्टर्ब हुई, चूंकि चीन विश्व का फेक्टरी है इसलिए बहुत सारे देशो में कई वस्तुओं की कमी हो गई। भारत की बात करें तो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में प्रयोग किए जाने वाले चिप की कमी हो जाने के कारण कार,कंप्यूटर  जैसी वस्तुओं के दाम बढ़ गए। 

इसके अलावा पिछले दो सालो से काफी गर्मी पड़ी है जिससे गेहूं तथा अन्य फसलों का उत्पादन में कमी आई है। जिसकारण खाद्य पदार्थो की कीमत बढ़ी है।

अगर भारत की बात की जाए तो भारत में महंगाई के कारण वैश्विक कारण से मिलते जुलते  तथा कुछ अलग है। भारत की पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर दूसरे देशों पर निर्भरता अधिक है जिसे कारण उसको अधिक कीमत पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने पड़ते हैं। इसके महँगे होने से हर वस्तुओं की आवागमन महँगा हो जाता है, जिससे भारत में महंगाई बढ़ जाती है। 

भारत में कोविड 19 के मंदी के समय से ही इंटरेस्ट रेट काफी कम किया गया है ताकि लोग अधिक से अधिक वस्तुओं को खरीद सके और GDP में वृद्धि हो। इससे जीडीपी वृद्धि दर में तेजी तो आई साथ ही महंगाई भी बढ़ी।

यह तो हो गई महंगाई के बात, लेकिन इसका समाधान किया है?

अगर भारत की बात की जाए तो भारत को  पेट्रोलियम प्रोडक्ट के आयात को कम करना होगा और यह कम तभी की जा सकती है, जब भारत अधिक से अधिक रिन्यूएबल एनर्जी से अपनी ऊर्जा जरूरतों को  पूरा करे। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत विश्व बाजार से निर्धारित होती है जिसकी कीमत में काफी उतार चढ़ाव रहता है।

भारत में की खाद्य तेल का उत्पादन काफी कम है जिसके कारण हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात करना पड़ता है। लेकिन  किसी भी एक खाद्य तेल उत्पादक देश में समस्या होने पर पूरे विश्व में खाद्य तेल की कीमत बढ़ जाती है जिसके कारण खाद्य तेल महंगा  हो जाता है और इसका बोझ प्रत्येक भारतीयों को सहना पड़ता है।खाद्य तेलों में आत्मनिर्भता ही एकमात्र समाधान है।

भारत में ट्रेड डिफिसिट (व्यापार घाटा)  के कारण डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत कम है, जिसके आयात महंगा पड़ता है। जिससे भारत में पेट्रोलियम पदार्थ समेत अन्य आयातित वस्तुओं की कीमत अन्य देशों की तुलना में काफी महँगी रहती है। भारत को आयातित वस्तुओं को चिन्हित कर उन सभी वस्तुओ को भारत में ही उत्पादन करने की कोशिश होनी चाहिए। देशी तथा विदेशी, दोनों प्रकार के निवेश को आकर्षित करने के लिये आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

भारत को फिलहाल और व्याज दर बढ़ाना होगा। व्याज दर अगर बढ़ाया जाएगा तो मार्केट से पैसे कम हो जाएंगे, जिससे लोगों की परचेसिंग पावर कम हो जाएगी। और  कुछ हद तक महंगाई पर तात्कालिक स्तर पर लगाम लग सकती है।

इसके अलावा भारत में खाद्य विविधता (फूड डाइवर्सिटी) की काफी जरूरत है। किसी एक फूड पर अधिक निर्भरता एवं उसकी उत्पादकता की अनिश्चितता से महंगाई काफी बढ़ सकती है। अतः गेहूं - चावल के साथ-साथ अगर हम ज्वार-बाजरा, जौ, रागी जैसे अन्य खाद्यानों का उपयोग करें तो महंगाई को  कम किया जा सकता है। क्योंकि इस तरह की  फसल जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा सहनशील है।

आइए देखते हैं कि दुनिया में किस तरह से महंगाई पर लगाम लगाया जा सकता है। 

सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि पेट्रोलियम प्रोडक्ट की एक सामान मात्रा में सप्लाई  या जरूरत के अनुसार सप्लाई हमेशा बनी रहे। जिससे किसी एक देश की सप्लाई डिस्टर्ब होने पर पूरे विश्व पर उसका असर ना पड़े। पेट्रोलियम पदार्थ के महंगे होने का असर केवल एक देश पर नहीं बल्कि पूरे विश्व की GDP पर पड़ता है। अतः अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी एक देश की सप्लाई अगर कम हो गई तो दूसरे देश अधिक उत्पादन कर डिमांड के अनुसार पेट्रोलियम पदार्थ की सप्लाई को बरकरार रखें।

युद्ध जितनी जल्दी हो सके, खत्म किया जाना चाहिए। युद्ध से फायदा तो कुछ नहीं है, केवल नुकसान ही है। युद्ध में सम्मिलित देश के लोगों का सीधा नुकसान है तथा विश्व के अन्य लोगों पर बढ़ती महंगाई के रूप में नुकसान पहुंचाती है।

Climate change के कारण भी हमारी खाद्य उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। समुद्र तटीय इलाके में समुद्र का खारा पानी भर जाने से उत्पादक क्षेत्र बंजर होता जा रहा है। ग्लेशियर के पिघलने से बाढ़ जैसी समस्याओं के कारण मैदानी क्षेत्र में भी उत्पादन पर असर पड़ा है। अधिक गर्मी से गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन 20% तक घट गया है। 

इसके अलावा  यह भी  कोशिश करनी चाहिए कि सप्लाई चैन हमेशा सही ढंग से काम करें। किसी एक देश पर अधिक निर्भरता के कारण सप्लाई चेन पूरे विश्व की डिस्टर्ब हो सकती है। चीन में कोविड-19 के लॉक डाउन से पूरे विश्व की सप्लाई चेन टूट गई थी  क्योंकि पूरा विश्व चीन के उत्पादित वस्तुओं का खरीददार  है। चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने ले लिये अन्य देशों में भी निवेश को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। 



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सोमवार, 16 मई 2022

क्यों भारतीय रुपए की कीमत डॉलर की तुलना में कम हो रही है?

क्यों भारतीय रुपए की कीमत डॉलर की तुलना में कम हो रही है? 

आज दिनांक 16 मई 2022 की बात करें, तो एक डॉलर की कीमत भारतीय रुपए में 77.75 रुपए हैं। जबकि मार्च 2020 के  कोविड के समय ₹70 के आसपास थी। इसी तरह से 2013 में भी यह ₹70 की ऊंचाई को छुआ था जबकि और थोड़ा पीछे और जाते हैं तो 2010 में $1 की कीमत 45 भारतीय रुपए थी। 

वर्तमान में डॉलर की कीमत रुपए की तुलना में सबसे उच्चतम स्तर पर है। इसका आशय यह है कि रुपए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर हो रहा है। रुपए की तुलना में डॉलर मजबूत हो रही है। 

आइए इसे समझते हैं। ऐसा क्यों होता है? 

भारतीय रुपए और डॉलर के बीच के संबंध को केवल भारत के परिदृश्य में नहीं बल्कि पूरे विश्व की आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य में ही देखकर समझा जा सकता हैं। 

इसे समझने के लिए सबसे पहले यूएस डॉलर करेंसी इंडेक्स को समझना सबसे जरूरी है। 

यूएस डॉलर इंडेक्स 6 अंतर्राष्ट्रीय करेंसी की एक बास्केट का यूएस डॉलर के साथ तुलना है। इन 6 मुद्रा में यूरो, जापानी येन,  स्टर्लिंग पाउंड, कैनेडियन डॉलर, स्वीडिश क्रोना एवं स्विस फ्रैंक शामिल है। 

वर्तमान में यूएस डॉलर इंडेक्स भी अपने सबसे उच्चतम स्तर पर ट्रेड कर रहा है। फिलहाल यूएस डॉलर इंडेक्स 104.54 पर ट्रेड कर रहा है। 

रूस यूक्रेन युद्ध एवं उससे उत्पन्न  ऊर्जा संकट से पहले अर्थात 2022 के मार्च में यह $102 था जबकि 2021 के अप्रैल के समय यह $100 से नीचे। जबकि 2017 के जनवरी में $103 रहा है। 

जब 2008 में अमेरिकी बाजार में सब प्राइम संकट आया था तब या अपने निम्नतम स्तर पर था  $70 के आसपास।

अगर और पुराने इतिहास की बात करें तो 2000 से 2002 के बीच में जब डॉट कॉम बबल आया था और उससे मंदी (रिसेशन) उत्तपन्न हुई, एवं उस समय यह $120 के आसपास पहुंच गया था। 

 इन डाटा का निष्कर्ष क्या है? 

अगर इतिहास से शुरू करें तो डॉट कॉम बबल जब फूटा तो कई सारे देशों में खासकर वहां की आईटी सेक्टर में काफी बिकवाली (शेयर बाजार) आई, जिससे एक रिसेशन का वातावरण बना एवं उसी समय वर्ल्ड ट्रेड सेंटर(9/11)पर भी हमला हुआ था।

उस समय यूएस डॉलर करेंसी इंडेक्स $120 के पार चला गया। यूएस डॉलर इंडेक्स का ऊपर की ओर जाना, US डॉलर की मजबूती का संकेत है। जब भी इंडेक्स ऊपर की ओर जाता है तो डॉलर की तुलना में अन्य मुद्रा कमजोर होती है।  जब अन्य करेंसी मजबूत होती है तो इंडेक्स नीचे की ओर जाता है। 

डॉट कॉम बबल के बर्स्ट होने पर दुनिया के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा, और उन अर्थव्यवस्था की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था ज्यादा मजबूत रही। इसी तरह से जब कोविड-19 आया तब भी यही स्थिति देखी गई। डॉलर मजबूत हुआ तथा  अन्य करेंसी कमजोर हुई। 

क्यों ऐसा होता है कि जब दुनिया की अन्य देशों की अर्थव्यवस्था में समस्या दिखती है तो यूएस का  डॉलर मजबूत होता है?

इसे वैश्विक राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य से समझना पड़ेगा। 

यूनाइटेड स्टेट दुनिया की सबसे शक्तिशाली एवं सबसे स्थिर देश है, जहाँ ह्यूमन राइट्स , लोकतंत्र को अधिक महत्व दिया जाता है। यह विश्व की सबसे बड़ी सैन्य एवं आर्थिक महाशक्ति है। अंतरष्ट्रीय संस्थान जैसे World bank, IMF आदि पर इनका प्रभाव अधिक है। इन कारणों से यह माना जाता है कि US किसी भी संकट का सामना अन्य देशों की तुलना में बेहतर ढंग से कर सकती है। 

इसके अलावा दुनिया में जितने भी ट्रेड होते हैं, 90%  डॉलर में ही होते है। डॉलर एक तरह से इंटरनेशनल करेंसी की तरह काम करती है।

 क्यों डॉलर इंटरनेशनल करेंसी की तरह काम करती है? तो इसका एकमात्र जवाब है कि जिस देश की इकोनॉमी सबसे स्टेबल है,सबसे बड़ी है एवं जो देश सबसे शक्तिशाली है वहां की   अर्थव्यवस्था पर लोगों का विश्वास अधिक होता है और यह माना जाता है कि यह  करेंसी है और इस देश की  इकोनामी है बुरी से बुरी परिस्थितियों में दूसरे देशों की तुलना में अधिक बेहतर और कुशलता पूर्वक कार्य करेगी इसलिए लोगों / संस्थानों का भरोसा इनकी करेंसी पर अधिक होता है। 

इसलिए कहीं भी दुनिया में संकट आती है। तो डॉलर मजबूत होता है। 

इसको एक अन्य दृष्टिकोण से  समझते हैं। 

जब जब दुनिया के अन्य देशों में संकट होता है या विश्वव्यापी संकट आता है तब फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर यानी FII किसी देश में किए गए इन्वेस्टमेंट को वह निकालने लगती है।  जब वहां पर वह बिकवाली करेगी तो उस देश से डॉलर के रूप में निवेश निकल जाएगा। जिससे उस देश मे डॉलर की कमी होगी और डॉलर की कीमत बढ़ जाएगी।

जब 2020 में कोविड संकट आया है तो पूरे विश्व के शेयर मार्केट में सेलिंग देखी गयी।  जितनी ज्यादा सेलिंग होती गई,  डॉलर ऊपर की ओर आता गया और उस देश की करेंसी का वैल्यू कम होती गयी। 

यही स्थिति 2022 के मार्च से देखी गई है जब रसिया यूक्रेन वार शुरू हुआ और इस बार  साथ-साथ एक एनर्जी क्राइसिस भी उत्पन्न हो गई क्योंकि रूस पूरे यूरोप में पेट्रोलियम गैस का सप्लाई करता है। रूस पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट पर बैन लगा देने से पेट्रोलियम प्रोडक्ट की जो डिमांड है वह तो उतनी ही रही, लेकिन सप्लाई कम हो गई जिसके कारण क्रूड ऑयल की प्राइस बढ़ गया। जब क्रूड ऑयल की प्राइस बढ़ जाती है और जो देश क्रूड ऑयल के आयात पर ज्यादा निर्भर है, उनको अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, क्रूड ऑयल खरीदने के लिए, जिसे कारण उस देश की करेंसी की कीमत डॉलर के मुकाबले कम हो जाती है और डॉलर और मजबूत हो जाता है क्योंकि क्रूड ऑयल इंटरनेशनल बाजार में डॉलर से ही खरीदी जा सकती है।

जब अन्य देशों में रसिया यूक्रेन युद्ध का काफी नकारात्मक असर पड़ा, तब अमेरिका पर असर क्यों नहीं हुआ?

 इसका  सिंपल एक कारण है कि अमेरिका अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं है, एवं वह खुद पेट्रोलियम प्रोडक्ट का निर्यात करता है तथा इसके अलावा उसके अन्य energy resources है जो उनकी ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करने के लिए काफी है। 

 अगर भारत एवं यूरोप की बात करें तो वे अपने अधिकांश पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे इंपोर्ट करना पड़ता है।  मार्च 2022  से ठीक पहले  1 बैरल क्रूड ऑयल की कीमत $60 के आसपास थी जो अब एक $100 के से अधिक हो गई। जिसके कारण यूरोप के देशों एवं भारत को अधिक डॉलर खर्च करना पड़ रहा है और भारत एवं यूरोप से डॉलर की निकासी हो रही है जिसके कारण भारत और यूरोप में उसकी करेंसी का अवमूल्यन हो रहा है और वह करेंसी डॉलर की तुलना में सस्ती होती जा रही है। 

इसके अलावा एफआईआई  किसी भी देश के शेयर मार्केट से पैसा तब निकालते हैं जब यूएस में फेडरल रिजर्व अपनी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज की इंटरेस्ट रेट बढ़ाती है फिलहाल मार्च 2022 के बाद से यूएस गवर्नमेंट सिक्योरिटी के रेट में बढ़ोत्तरी हुई है। जिसके कारण debt asset class, equity asset class की तुलना में अधिक फायदेमंद लगने लगा है। जिसके फलस्वरूप भारत एवं अन्य देशों से एफआईआई ने शेयर बाजार में बिक़वाली कर उसे यूएस इकोनॉमी के गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में डाला जा रहा है। 

एफआईआई की सेलिंग के कारण बड़ी मात्रा में भारत एवं अन्य देशों से डॉलर बाहर निकला है। 

जिसके फलस्वरूप रुपए डॉलर की तुलना में गिरा है। इसी तरह यूरो भी अपने 5 साल के निम्नतम स्तर पर है। इसका भी वही कारण है  नेचुरल गैस की supply,  रूस यूक्रेन युद्ध एवं FII की बिकवाली। 

अमेरिका को एक इस चीज का भी फायदा पहुंचता है कि अमेरिका प्राकृतिक एवं राजनीतिक रूप से शत्रुओं से सीमा नहीं लगती है।  जिसके कारण वह एक तरह से विदेशी हमलों से  सुरक्षित है। 

इसके अलावा एनर्जी पर उसकी निर्भरता दूसरे देशों में नहीं है और उसकी अर्थव्यवस्था उच्च टेक्नोलॉजी पर निर्भर है जिसका कोई प्रतिस्पर्धी फ़िलहाल नहीं है। जर्मनी भी एक high-technology आधारित अर्थव्यवस्था है परंतु उसका साइज अमेरिका की तुलना में काफी कम है। एवं high tech आधारित अमेरिकी कंपनियों का एक तरह से एकाधिकार है विश्व बाजार में। 

इन सभी चीजों को मद्देनज़र रखते हुए जब कभी वैश्विक बुरी परिस्थितिया आती है  तब लोगों एवं संस्थानों  को अपने पैसे अमेरिका के बाजार में इन्वेस्ट करना या अमेरिका की गवर्नमेंट सिक्योरिटी में इन्वेस्ट करना ज्यादा  अच्छा, फायदेमंद एवं सुरक्षित लगता है इसलिए हमेशा से जब जब कोई भी क्राइसिस आती है तो अन्य देशों की करेंसी में बिकवाली आती है और डॉलर मजबूत होता जाता है।

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रविवार, 15 मई 2022

क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है?


भारत के संविधान के अनुसार हिंदी का उल्लेख आर्टिकल 343 में है, जिसमें यह कहा गया है  संघ (union) की ऑफिशियल लैंग्वेज अर्थात राजकाज की भाषा हिंदी होगी जो देवनागरी स्क्रिप्ट में लिखी जाएगी। 

साथ ही ऑफिशियल लैंग्वेज एक्ट 1963 के तहत हिंदी के साथ-साथ संघ के राज काज के लिए इंग्लिश को भी मान्यता दी गई है तथा केंद्र एवं अहिन्दी राज्य के बीच में कम्युनिकेशन के लिए इंग्लिश तथा हिंदी राज्यो के साथ हिंदी का प्रयोग का प्रावधान है। 

भारत के संविधान या भारत के कानून में ऐसा कहीं भी कुछ भी वर्णित नहीं है जिसमे हिंदी को पूरे राष्ट्र की भाषा के तौर पर मान्यता प्राप्त है। हिंदी केवल राजकाज की केंद्र की राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। 

साथ ही साथ प्रत्येक राज्य का अपना क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान  है जिससे वह अपना शासन कार्य उस भाषा में वह कर सकते हैं। वह भाषा हिंदी या हिंदी के अलावा अन्य भाषा हो सकती है। 

लेकिन समय-समय पर यह विवाद उठता रहता है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी को थोपा जा रहा है, या हिंदी को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है एवं  स्टॉप हिंदी इंपोजिशन जैसे कैंपेन सोशल मीडिया में चलाया जाता है। आइए देखते हैं इसमें क्या सच्चाई है? 

इस विवाद का मुख्य कारण लोगों की अज्ञानता है। उत्तर भरतीय लोग यह मानते हैं कि हिंदी पूरे देश की राष्ट्रभाषा है और सबको हिंदी आनी चाहिए। 

इसके अलावा दक्षिण भारत में खासकर तमिलनाडु में लोगों को यह भ्रम है कि हिंदी से तमिल भाषा का अस्तित्व और प्रयोग खतरे में पड़ जाएगी तथा उसकी भाषा की संस्कृति को नुकसान पहुंचेगा। 

उत्तर भारतीय लोगो का एक तर्क यह भी है कि उनकी भी मातृभाषा हिंदी नहीं है, किसी की अवधी है तो किसी की राजस्थानी, तो किसी की भोजपूरी तो किसी की अन्य कोई भाषा है, पर वो सभी हिंदी में एक दूसरे से बातचीत करते है। 
जब हिंदी का विरोध करने वाले और हिंदी का पुरजोर समर्थन करने वाले लोग कट्टर रुख अपनाते, तब विवाद उत्पन्न होता है। 

भारत एक बहुभाषी क्षेत्र है जहां पर हर 100 किलोमीटर में भाषा बदल जाती है। तो हमें हमेशा एक लिंक भाषा की जरूरत पड़ती है जिससे हम एक दूसरे से बात कर पाए, लेकिन वह भाषा क्या होनी चाहिए?

कुछ लोग यह मानते हैं कि लिंक भाषा हिंदी होनी चाहिए क्योंकि हिंदी सबसे अधिक क्षेत्रों में, सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। इसके अलावा कुछ लोग यह मानते हैं कि इंग्लिश होनी चाहिए ताकि किसी भारतीय भाषा का दूसरी भाषा पर प्रभुत्व ना हो। 

अगर भारत की वस्तुस्थिति देखी जाए तो दो भिन्न मातृभाषा वाले लगभग 70% लोगों द्वारा हिंदी का ही प्रयोग होता है तथा 10% से कम लोगो के द्वारा इंग्लिश का प्रयोग होता है। 
हिंदी से क्या फायदा और क्या नुकसान हो सकता है, इसे समझते हैं? 

हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।  हिंदी फिल्मों ने इसका प्रचार पूरे भारत में कर दिया है जिसके कारण अन्य भाषा के लोग भी हिंदी को समझने लगे हैं तथा बोलने भी लगे हैं एवं दो भिन्न भाषा वाले लोगो में कम्युनिकेशन के रूप में हिंदी का ही प्रयोग हो रहा है। 

हमें एक दूसरे से कम्युनिकेशन के लिए एक भाषा चाहिए जो फिलहाल भारत में हिंदी निभा रही है। 
एक लिंक लैंग्वेज नहीं होने पर कई सारी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है, रोजगार एवं आजीविका से इसका सीधा संबंध है। कम्युनिकेशन गैप की वजह से कई बार निर्दोष लोगों की हत्या तक हो जाती है। 

लेकिन क्या भारत में लिंक लैंग्वेज के रूप में  इंग्लिश का प्रयोग कर सकते है?

भारत में केवल 2% लोग ही हैं, इंग्लिश बोल पाते है। जिसके कारण कम्युनिकेशन में समस्या हो सकती है। हिंदी एवं अन्य उत्तर भारतीय भाषा की उत्तपत्ति संस्कृत से हुई है, जिस कारण हिंदी के  शब्द अन्य क्षेत्रीय भाषा जैसे गुजराती बांग्ला,असमिया आदि से काफी मिलते-जुलते हैं एवं बहुत सारे शब्द समान ही होते है। जिससे एक गुजराती को हिंदी सीखना ज्यादा आसान पड़ता है, उसी तरह से एक हिंदी भाषी के लिए गुजराती या मराठी सीखना कठिन नहीं है,  इसी तरह से एक बांग्ला या असमिया को हिंदी समझना एवं बोलना ज्यादा आसान पड़ता है,  इंग्लिश की तुलना में।  द्रविड़ भाषा समूह के भी बहुत सारे शब्द संस्कृत से लिए गए हैं। 

हिंदी पूरी तरह से भारतीय भाषा है लेकिन अंग्रेजों के 200 साल के शासन काल के कारण  इंग्लिश का प्रयोग भारत में  है साथ ही पूरे दुनिया में एक लिंक भाषा के रूप में इंग्लिश का प्रयोग किया जाता है। भारत में अधिकांश सरकारी काम, कोर्ट का काम भी इंग्लिश में होता है। इस कारण भारत में एक बड़ा समूह यह मानता है कि इंग्लिश को  लिंक भाषा के रूप में प्रयोग करना चाहिए। 

लेकिन हिंदी भाषा का एक बहुत बड़ा बाजार है। हिंदी भाषा के न्यूज़ चैनल, हिंदी भाषा के यूट्यूब वीडियो की पहुँच काफी अधिक होते हैं इंग्लिश भाषा की तुलना में। अगर भारत की बात की जाए तो तमिल भाषा की यूट्यूब वीडियो या इंग्लिश भाषा की यूट्यूब वीडियो की तुलना में  हिंदी भाषा की वीडियो की reach  अधिक होती है। जो जितना हिंदी से दूर होता है उसकी अपॉर्चुनिटी अन्य हिंदी जानने वालों लोगों की तुलना में कम हो जाती है। 

इसी तरह से कोई हिंदी भाषी अगर दक्षिण भारत के राज्य है या दूसरे अन्य हिंदीभाषी क्षेत्र में रह रहा है और वह उस क्षेत्रीय भाषा को नहीं जानता है तो उसके लिए भी समस्या रहती है। उसके लिए भी अपॉर्चुनिटी कम हो जाती है। 

इसका सबसे बड़ा सॉल्यूशन यह है कि भाषा लोगो को अपने जरूरत के अनुसार  सीखना एवं बोलना चाहिए। 

अगर कोई गैर तमिल तमिलनाडु सैलानी के तौर पर जाता है और वहां के लोग अगर ठीक से उससे communicate नहीं कर पाएंगे उसका अनुभव वह के टूरिज्म के प्रति खराब होगा जिससे वहाँ टूरिस्ट आना कम हो जाएंगे, अंतत उस राज्य को ही नुकसान होगा। यही बात दूसरे राज्य में भी कही जा सकती है। 

इसलिए! सबसे बेहतर या है कि आप जितनी अधिक भाषाओं को जाने उतना आपके लिए बेहतर है। भाषा सिखाने में जबरदस्ती नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को स्वेच्छा से अपनी जरूरत के हिसाब से भाषा सीखना चाहिए। जो जितनी अधिक भाषाएं जानेगा उतना  फायदे की स्थिति में रहेगा।

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शुक्रवार, 13 मई 2022

क्या भारत श्री लंका जैसी स्थिति की और बढ़ रहा है?

 कुछ लोग यह मान रहे हैं कि भारत श्रीलंका जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है। क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है?
आइये इसे समझते हैं। 

अगर वर्तमान समय की बात की जाए तो श्री लंका की स्थिति चिंताजनक है वहां उत्पन्न आर्थिक संकट अब राजनीतिक संकट एवं गृह युद्ध की ओर बढ़ चुका है। भारत समेत कई विदेशी संगठन श्रीलंका की मदद कर रहे है। परंतु इस आर्थिक संकट से उबरने में श्रीलंका को काफी समय लगेगा।

किस तरह की संकट का सामना श्री लंका अभी कर रहा है?
 श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम हो चुका है जिसके कारण वह अपनी जरूरत की वस्तुओं का आयात नहीं कर पा रहा है। इस स्थिति के कारण श्री लंका अनाज एवं पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की गंभीर कमी का सामना कर रहा है। वहाँ के पेट्रोल पंपों में लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं।  घर में खाना बनाने के  एलपीजी गैस की कमी हो चुकी है,अब लोग लकड़ी का प्रयोग खाना बनाने में कर रहे है। यही स्थिति बिजली तथा अन्य जरूरत के सामानों की है। 

श्रीलंका में यह संकट अचानक नहीं आया बल्कि यह काफी लंबे समय से गलत आर्थिक नीति का परिणाम है। श्रीलंका के कई बड़े निवेश प्रोजेक्ट  चीन के द्वारा दिए गए ऋण से किये गए, परन्तु उस प्रोजेक्ट से उनकी कोई आय नहीं बढ़ी और वह चीन के ऋण जाल में फंसता गया। उस ऋण के व्याज का भुगतान उसके सीमित विदेशी मुद्रा से होने लगा।

2020 के कोविड संकट से वहाँ के टूरिज्म इंडस्ट्री को काफी धक्का पहुंचा, जिसके कारण उसके विदेशी मुद्रा भंडार में काफी कमी आई।  साथ ही साथ 2014-15 में शुरू की गई जैविक खेती, जिसमें रासायनिक खादों का प्रयोग बंद कर दिया गया, जिससे अनाजों के उत्पादन में काफी कमी आई और खाद्य पदार्थो के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ गयी। 

इन्ही कारणों की वजह से वहां पर वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम हो गया और पेमेंट सप्लाई की समस्या उत्पन्न हुई, और वह पेट्रोलियम गुड्स के साथ अनाज के आयात करने में असमर्थ हो गया और इन वस्तुओं की भारी कमी हो गयी।

श्रीलंका की यह स्थिति विश्व में कोई नई नहीं है, बल्कि कई देश पहले भी गलत आर्थिक नीतियों के कारण इस स्थिति का सामना कर चुके है। भारत भी 1990 में इस स्थिति का सामना कर चुका है।  वर्तमान में कई देश अभी भी इस तरह की स्थिति का सामना कर  रहे है। फिलहाल नेपाल ने भुगतान संकट के कारण गैर जरूरी आयात को कम किया है। 

कोविड-19 के कारण अमेरिका अपने अप्रत्याशित खर्च को पाटने के लिए अत्यधिक मात्रा में डॉलर की प्रिंटिंग की और उसे खुले बाजार में डाल दिया, जिससे वैश्विक महंगाई उत्पन्न हुई, क्योंकि अमेरिकी डॉलर अघोषित रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में कार्य करता है। इस महंगाई के आग में घी डालने का काम रसिया यूक्रेन वार ने किया। 

महंगाई के कारण जो देश आयात पर अधिक निर्भर है और जिसकी आय कम है, उनकी आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। 

यह आर्थिक संकट कई देशों में दिख रहा है। अगर स्थिति ठीक नहीं हुई तो श्रीलंका जैसी स्थिति और कई देशों में भी हो सकती है। लेकिन क्या  भारत में भी ऐसी स्थितियां हो सकती है? 

इसे समझने के लिए हमें भारत की भुगतान संतुलन को समझना होगा। 

भारत में गुड्स का आयात, निर्यात से अधिक है और इस trade deficit के कारण जितनी विदेशी मुद्रा भारत आती है,उससे ज्यादा बाहर जाती है। फिर भी भारत में भुगतान संकट संकट नहीं है। 

 इसका सबसे बड़ा कारण है वो भारतीय जो भारत से बाहर रहते है और वहाँ से बड़ी मात्रा में रेमिटेंस भारत भेजते हैं। इसके अलावा FDI एवं FII के रूप में एक बड़ी मात्रा में धन हर साल भारत में आ रहा है। 

विदेशी मुद्रा (डॉलर) भारत लाने में टूरिज्म और सर्विस का एक्सपोर्ट भी एक बड़ी भूमिका निभाता है जिसके कारण हम लोगों का भुगतान संकट 1990 के बाद कभी पैदा नहीं हुआ एवं लगातार डॉलर रिजर्व बढ़ता जा रहा है। 

वर्तमान में की स्थिति की बात करें तो भारत में भी महंगाई बढ़ती जा रही है। महंगाई का सबसे बड़ा कारण अंतरास्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों एवं खाद्य तेलों का कीमत बढ़ना है। 

रूस - यूक्रेन युद्ध के कारण यूक्रेन से गेहूं एवं सूर्यमुखी के तेल की सप्लाई बंद हो गयी। चूंकि भारत खाद्य तेल का net importer है, इसलिए यहाँ खाद्य तेल की कीमत काफी बढ़ गयी। साथ ही वैश्विक बाजार में गेहूं की सप्लाई भारत से होने के कारण भारत में   आटे की कीमत में 15% की वृद्धि हुई है। इस सभी कारणों के कारण भारत में महंगाई अपने रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन 75% परिवारों को खाद्य सुरक्षा में काफी कम कीमत पर खाद्य सामग्री देने के कारण महंगाई की मार से आम जनता को थोड़ी राहत है।

इन सभी स्थितियों के बावजूद भी भारत में भुगतान संकट या फॉरेन रिजर्व में कमी जैसी स्थिति नहीं दिखती है। भारत के पास जितना रिजर्व है उससे इस तरह के कई संकटों का सामना कई सालों तक वह आसानी से कर सकता है। साथ ही भारत GDP विकास दर भी विश्व में सबसे अधिक है। हाँ महंगाई के कारण जनता पर बोझ बढ़ा है लेकिन जब विश्व में परिचालित डॉलर के अनुपात में वैश्विक GDP समान हो जाएगी तब ही महंगाई कम हो पाएगी।