शुक्रवार, 18 जून 2021

क्या हर प्रतिबंधों से आजादी संभव है? Is freedom from all restrictions possible?


क्या ऐसा संभव है कि हम इंसानों पर किसी भी प्रकार का कोई भी प्रतिबंध ना हो, क्या पूर्ण आजादी कहीं दिखती है? क्या कोई इंसान हमें ऐसा दिखता है जिस पर किसी का भी जोर नहीं चलता है एवं वह अपने अनुसार अपना जीवन यापन करता है?


हम लोग में से अधिकांश लोग हमेशा से यह चाहते हैं कि हम लोगों पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध या रोक ना हो।  हम लोग वस्तुतः एक मुक्त जीवन की कामना करते हैं, एक  ऐसा मुक्त जीवन  जो किसी को शायद ही मिला  हो, पर हमारी इच्छा कई बार इस तरह की जीवन जीने की जरूर होती है। 


सामाजिक जीवन में हमेशा इस बात की चर्चा होती रही है कि हमें कितनी आजादी मिलनी चाहिए, हम पर कितना प्रतिबंध होना चाहिए, आदि। इसी को ध्यान में रखते हुए समाज, परिवार के नियम, धर्म,  देश के  कानून आदि बनाए गए हैं।  यह नियम और कानून हमें कई सारी आजादी देती है तथा कई जगह हमारी आजादी को छीनती है या कम करती है। कई जगह हमारे पर सकारात्मक प्रतिबंध लगाती है और कई जगह हमें नकारात्मक स्वतंत्रता भी देने का कोशिश करती है। हर उम्र के लोगों पर, हर प्रकार के सामाजिक- आर्थिक  ताने-बाने के लोगों पर सदियों से नियम या कानून लागू किया गया है। परंतु यह भी पाते हैं कि कहीं भी, किसी भी काल में कोई एक ऐसी एक समान व्यवस्था, स्वतंत्रता देने की या स्वतंत्रता छीनने की नहीं हो पाई है।  समय एवं काल के अनुसार इसके स्वरूप लगातार बदलते रहे हैं।  वर्तमान में भी बदल रहे हैं, और ऐसी उम्मीद है कि भविष्य में भी एवं अलग-अलग स्थानों में भी बदलते रहेंगे।  क्यों ऐसा होता है कि हम सभी इंसान या निश्चय नहीं कर पाते हैं कि हमें किस प्रकार की आजादी मिलनी चाहिए, हम पर किस प्रकार का प्रतिबंध होना चाहिए, क्यों इतनी  विविधता है समय एवं काल के अनुरूप?


हमें स्वतंत्रता देने वाले या प्रतिबंध लगाने वाले नियम-कानून, लोगों के स्थान एवं काल के अनुसार उपजी सामूहिक  मानसिकता के आधार पर उनको मिलती रही है।  जैसा समाज होगा, जैसा उनकी सोच होगी, या जिस तरह के लोग की उस समाज में प्रभाविता  रहेगी, उस प्रकार के नियम-कानून पूरे समाज के सभी लोगों पर लागू किए जाएंगे।  एक तरह से देखा जाए तो यह collective conscience प्रतीत होता है। 


मनुष्य का इतिहास को देखा जाए तो पाषाण काल या उससे पहले से ही यह चीज समझ में आ गई कि समूह में रहकर की वह अपने से काफी बड़े-बड़े शक्तिशाली जानवरों को मार सकता है या उसे पा लतू बना सकता है, इसलिए उस समय से ही मानव  बस्तियों में रहने लगे, जिससे उसकी जान माल की सुरक्षा अच्छे से होने लगी। 
लेकिन क्या कभी आपने या हमने सोचा है कि उस समय अगर कोई मनुष्य समूह से हटकर अकेला जीवन यापन करे तो क्या-क्या समस्याएं उत्पन्न हो सकती है उसे। देखा जाए तो जीवन जीने के लिए केवल भोजन ही काफी नहीं है, हमें अन्य चीजों की भी जरूरत पड़ती है। अकेले रहने की तुलना में समूह के साथ रहने में हमारी बहुत सारी आवश्यकताओं का आसानी से पूर्ति हो जाती है। जिस कारण अकेले रहने की तुलना में मनुष्य समूह में रहना ज्यादा पसंद करता है। 


अगर हम वर्तमान समय की बात करें भी आदि काल से चली आ रही समूह में रहने की मनुष्य की व्यवस्था से कुछ अलग नहीं है।  आज भी हमें परिवार, नाते- रिश्तेदार, मित्रों की जरूरत पड़ती रहती है जब हम बच्चे थे, तब माता-पिता की जरूरत होती है, जब हम बूढ़े  होते हैं अपने बच्चों की जरूरत पड़ती है।  मानसिक तनाव के समय प्यार से सांत्वना देने वाले जीवनसाथी की  जरूरत होती है। जब हम खुश होते है तब भी हमें खुशियां बांटने के लिए साथी की जरूरत होती है। 


क्या स्वतंत्रता या प्रतिबंध, दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तिगत लागू पड़ती है? इस पर बात की जाए तो, अमेरिका के राष्ट्रपति, विश्व की सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन क्या वह भी हर समय अपनी मनमर्जी का कर सकते हैं? क्या उस पर कोई प्रतिबंध का लागू होना बेमानी प्रतीत होती है? अगर इसे आप गहराई से देखे तो अमेरिका का राष्ट्रपति भी कई सारी प्रतिबंधों से युक्त है।  वह ऐसा कदम नहीं उठा सकता है जो वहाँ की अधिकांश जनता की सोच के विपरीत हो, चाहे उस पर कितना भी विश्वास या इच्छा क्यों ना हो। अगर वह जनता की इच्छा के विपरीत कदम उठाने लगेगा तो अगले चुनाव में जनता उसे राष्ट्रपति के पद से जनता हटा सकती है, फिर वह आम नागरिक की तरह रह जाएगा। 


 अगर बात की जाए तो किसी एक भारतीय परिवार में कमाने वाले पुरुष की,  क्या वह  किसी प्रतिबंधों से युक्त नहीं है? क्या वह अपनी मर्जी से हर कुछ कर सकता है? तो यहां भी यह पाते हैं कि वह भी कई प्रकार के प्रतिबंधों से युक्त है, उसे भी परिवार के नियम का पालन करना पड़ता है अगर वह अपने परिवार को साथ लेकर नहीं चलता है, तो परिवार वाले भी को उनका त्याग कर सकते हैं। 


 हम अपने समाज में देखते हैं कि कई साधु- संत जो अपने परिवार को छोड़कर विचरण करते रहते हैं, तो क्या वह पूर्ण रुप से स्वतंत्र हैं और किसी पर निर्भर नहीं है? क्या उस पर कोई कानून या प्रतिबंध लागू नहीं पड़ता है? यहां पर भी या कहा जा सकता है कि  वह अपने जीवन यापन के लिए दूसरों के दान पर निर्भर है, तथा उस पर भी समाज के तथा देश के कानून लागू पड़ते है।  वह भी जब बीमार पड़ता है, तो डॉक्टर की शरण में जाता है। 


महान दार्शनिक रूसो का कहते है कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सदा जंजीरों में जकड़ा रहता है,  हर कथन हर का ल एवं स्थान के लिए उपयुक्त जान पड़ता है।


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