शनिवार, 11 जुलाई 2020

विकास दुबे का एनकाउंटर : न्याय या बदला



 2 जुलाई की रात एक बुरे सपने जैसा था। 8 पुलिसवालों की हत्या वह भी एक गुंडे के द्वारा, कैसे एक लोकल गुंडे ने 8 पोलिसवालो को मार दिया, इसने कई बिन्दुवों पर एक साथ प्रश्न उठाया:

पुलिस की मिलीभगत,
नेताओं द्वारा गुंडों का संरक्षण,  
न्यायपालिका की असक्षमता।

      ऐसा बड़ी हत्याकांड किसी एक गुंडे द्वारा की गई कार्रवाई, वो भी पोलिसवालों की, अपने आप में कुछ अलग और नया था। कोई भी गुंडा इस तरह से इतनी बड़ी संख्या में पुलिस वालों पर हमला नहीं करता है, और इतनी बड़ी संख्या में पुलिस वालों की जान नहीं लेता है, ऐसा तो हाल फिलहाल के इतिहास में नहीं देखा गया है
                                                                                                                                                           पुलिस एवं सरकार की शर्मिंदगी, जनता में रोष, इन सभी ने हर बार की तरह एक माहौल बनाया, कि इस तरह के अपराधियों को मार ही दिया जाना चाहिए और यही न्याय है। आम जनता इस तरह के अपराधियों लंबे समय तक उनका बिना सजा  पाये गुंडई करते हुए देखकर तंग आ चुकी हैं, लोगो को लगता है कि न्यायपालिका द्वारा न्याय मिल ही नहीं सकती हैइसी तरह से कोई भी गुंडा नेता बन जाएगा और उनकी गुंडई चलती रहेगी, इसलिए जनता भी उनके एनकाउंटर का खुले दिल से समर्थन करती हैं। 
       चलिए देखते हैं क्या होता है अगर उन्हें अरेस्ट किया जाता है?

1.    कोर्ट उन्हें जल्द से जल्द सजा देती और वह आजीवन जेल में सजा पूरी करता या फांसी की सजा होती। उनके अरेस्ट किए जाने पर और बिभिन्न मामलो में अच्छे से जांच पर नए-नए राज खुल सकते थे। पुलिस एवं नेताओं की मिलीभगत का पता चल सकता था। जिससे पूरे सिस्टम की सफाई भी हो सकती थी।

2.    उन्हें अरेस्ट करने के बाद कोर्ट में उनकी कई सालों तक हियरिंग चलती। पुलिस कुछ भी प्रू नहीं कर पाती फिर उन्हें जमानत या बेल मिल जाता या वह जेल से भी अपनी अपराधिक गतिविधियां जारी रख सकता या बाहर निकलता तो फिर से वही गुंडई करता। कुछ सालों बाद वो बड़ा नेता भी बन सकता था।

      जिस तरह से हमारे देश की कोर्ट काम करती है, वहाँ उम्मीद कम है कि पहली सिचुएशन के अनुसार काम होता और न्याय मिलता, सभी को यही लगता है कि अरेस्ट होने के बाद दूसरी सिचुएशन के अनुसार ही सब कुछ चलता। विकास दुबे ने 20 साल पहले पुलिस थाने में ही एक सरकार के मंत्री को मार चुका है और उस मामले में उसे कोई सज़ा नहीं हुई नहीं है।

      उनके एनकाउंटर से शहीद पुलिस वालों के परिवारों को एक थोड़ा संतोष मिला कि न्याय हुआ है, बदले की भावना जो सीने मेँ थी वह ठंडी हो चुकी है। पुलिस को भी लगता कि हमने बदला ले लिया है, जनता भी खुश हो जाती चलो एक गुंडा कम हुआ। सरकार को भी लगता है कि हमें चुनौती देने वाला अब इस  धरती पर नहीं है और अब हमारा ही शासन है।

      विकास दुबे को कई पोलिसवालों ने ही पुलिस के आने की सूचना दी थी, कई राजनीतिज्ञो से उनके अच्छे संबद्ध थे, शायद इन्ही वजहों से ही अब तक सेकड़ों आपराध करने के बाद भी वह सजा से दूर था। विकास दुबे ने गोली जरूर चलायी, पर इस बंदूक को सहारा देने वाला कंधा इन्ही राजनीतिज्ञो का ही था, विकास के बंदूक मे कारतूस भरने वाले वो पोलिसिया मुखबिर ही थे। अगर जनता यह सोचती है कि विकास दुबे और उसके गुर्गों को मार देने से इंसाफ हो गया है, तो वो भुलावे में है। अगर पुलिस के एंकाउंटर को ही इंसाफ माना जाय तो उन मुखबिर पोलिसवालों और राजनीतिज्ञो का भी एंकाउंटर होना चाहिए। यही राजनेता और पोलिसवाले फिर नए विकास दुबे पैदा करेंगे।  

      विकास दुबे के मरने के बाद, क्या अब फिर कोई नया विकास दुबे पैदा नहीं होगा या फिर से कोई गुंडा गुंडई  नहीं करेगा, क्या फिर से लोगों की जमीन हड़पने वाला, पुलिस वालों को मारने वाला नहीं पैदा होगा? अगर यह कहे कि गुंडो द्वारा बड़ी वारदात मेँ कुछ समय के लिए विराम लग सकता है तो यह गलत नहीं है। अगर इस तरह से सभी गुंडों को मार दिया जाए तो एक डर तो पैदा होगा, जिससे कुछ समय के लिए गुंडे शायद पनपने बंद हो जाए, लेकिन कुछ समय बाद फिर से नई गुंडे पनपने लगेंगे। पूर्ण रूप से गुंडो का उन्मूलन इस तरह से तो नहीं किया जा सकता है।

      इसके अलावा पुलिस द्वारा ही न्याय करते रहने से पुलिसया गुंडे एक नई भूमिका सामने आएगी, जहां पर पुलिस निरंकुश होकर काम करेगी। सत्ता के नशा में वह किसी को भी मार सकती है। यहां न्यायपालिका का स्थान पुलिस ले चुकी है, एक तरह से पुलिस अधिकारवादी हो चुकी है, जो पुलिस बोलेगा वही होगा।  लोग पुलिस से भय  खाने लगेंगे। समाज का जो एक चेक एंड बैलेंस बना हुआ है, वह टूट जाएगा।

      कल भीड़ (लोगो मे समूह) भी किसी को भी गुनाहगार मान कर हत्या करने लगेगी। किसी एक जनसमूह को लगता है कि कोई व्यक्ति किसी भी अपराध मेँ गुनाहगार है, तो उन्हें तो मार ही दिया जाना चाहिए। जब भीड़ (मोब) को जब भी अपने से अलग कुछ नजर आता है, तो उसे शक की नजर से देखने लगता है और एक झूठी अफवाह के साथ जोड़कर उसे अपराधी मानने लगता है और फिर होता है mob lynching, हमने हाल फिलहाल के वर्षों में कई सारे निर्दोष लोगों को mob lynching में मरते देखा है।  यह वही लोग हैं जिन्हें लगता है कि मैंने तो सही किया है। सामने वाला अपराधी था उन्हें तो मार ही दिया जाना चाहिए।  

      पर यह एक आदर्श स्थिति नहीं है, यह समाज की सबसे खराब व्यवस्था है। इसमें लगता तो है कि सही हो रहा है, लेकिन वास्तविकता में यह एक खराब समाज उत्पन्न करता है। जो समाज नियमों पर नहीं चलता है, उसका पतन निश्चित है। यह एक मत्स्य न्याय की वाला समाज है जहाँ बड़ी मछ्ली, छोटी मछ्ली को खा जाती है, जहां पर शक्तिशाली लोग या शक्तिशाली संगठन अपने से कम शक्तिशाली या कमजोर संगठन या लोगों को मारकर खा जाती है। यहां भी वही होता है, बड़ी संख्या में लोग क्या चाहते हैं, वह महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां बड़ी संख्या में लोग चाहते है कि विकास दुबे का एनकाउंटर होना चाहिए, तो हो जाता है। किसी भी सिस्टम में अपराधी  को सजा दिलाने के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। यहां सीधे-सीधे प्रक्रिया को ही लांघ कर पुलिस द्वारा खुद के द्वारा किसी को अपराधी घोषित कर पुलिस द्वारा ही न्याय किया जाना किसी भी देश के लिए आदर्श नहीं हो सकती है।  

      आप एक ऐसे समाज में नहीं रहना चाहेंगे जहां पर गुंडे बदमाश का राज चलता हो और जो आम लोगों को परेशान करता हो। लेकिन आप ऐसे राज्य में भी नहीं रहना चाहेंगे जहां पर पुलिस निरंकुश हो, पुलिस चाहे तो किसी को भी मार सकती है किसी पर भी झूठे मुकदमे कर सकती है। 

      निश्चित ही हमें वैसा समाज चाहिए, जो गुंडे बदमाशों से मुक्त हो, लेकिन कोई भी प्रशासनिक अधिकारी यह राजनेता निरंकुश भी ना हो। जहाँ  हम किसी के विरुद्ध भी न्याय के लिए न्यायपालिका जा सकते हैं और हमें जल्द न्याय मिले।  वास्तव में आदर्श व्यवस्था वही है जहां पर चेक एंड बैलेंस है, जहाँ कोई भी निरंकुश ना हो सके।  

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