शनिवार, 16 मई 2020

साहित्य में दर्शन

प्रेमचंद रचित "गोदान" में जब खन्ना की चीनी मिल जल जाती है तब उसकी पत्नी उसे समझाती है और कहती है, "तुम इसे विपत्ति समझते ही क्यों हो? क्यों नहीं समझते, तुम्हे अन्याय से लड़ने का अवसर मिला है। मेरे विचार से तो पीड़क होने से पीड़ित होना कही श्रेष्ठ है। न्याय के सैनिक बन कर लड़ने में जो गौरव, जो उल्लास है, क्या उसे इतनी जल्दी भूल गए?"

वैसे तो संपूर्ण  उपन्यास जीवन दर्शन है, पर ये पंक्तियां कुछ विशेष है जो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित करती है। अगर रावण का अन्याय और अधर्म ना होता तो आज राम का नाम भी ना होता। इसलिए विपत्ति आना भी एक मौका है , कुछ लोग विपत्ति में टूट जाते है आज संघर्ष छोड़ देते है, और कुछ लोग सामना करते है, और निखरते है, विजेता कहलाते है।

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