शनिवार, 16 मई 2020

शरद ऋतु

मुझे सबसे सुहावनी ऋतु शरद ऋतु लगती है, मानसूनी हवाएं लौटने लगती है और बारिश होना बंद हो जाती है, रातो में ठण्ड बढ़ने लगती है। दिन और रात बराबर होने लगते है। वैसे तो शरद ऋतु वर्षा ऋतु के उत्तराध आश्विन और कार्तिक महीने को माना जाता है परन्तु सबसे बेहतरीन समय इस मौसम का नवरात्र से दीपावली और छठ पूजा तक का होता है जब दिन में भी सूर्य के किरणों का तीव्रता कम होने लगती है, और हाँ, त्योहारों के कारण चेहरा प्रदीप्तमान रहता है। त्योहारों का आनंद इस मौसम के कारण कई गुना बढ़ जाता है। इस समय का मुझे वेसब्री से इंतजार रहता है।

शरद् ऋतु के सुहावने मौसम में ऐसा कोई सरोवर नहीं है जिस में सुन्दर कमल न हों, ऐसा कोई पंकज नहीं है जिस पर भ्रमर नहीं बैठा हो, कहने का आशय है कि सभी सरोवर कमल के फूलों से ढक जाते है और उसपर भँवरे मंडराते हैं।

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में शरद ऋतु का गुणगान करते हुए लिखा है - बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

अर्थात हे लक्ष्मण! देखो वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने कास रूपी सफेद बालों के रूप में अपना वृद्घावस्था प्रकट किया है। 

कुछ इसी तरह का वर्णन कालिदास ने ऋतु संहारम में किया है, उसके अनुसार 'लो आ गई यह नव वधू-सी शोभती, शरद नायिका! कास के सफेद पुष्पों से ढँकी इस श्वेत वस्त्रा का मुख कमल पुष्पों से ही निर्मित है और मस्त राजहंसी की मधुर आवाज ही इसकी नुपूर ध्वनि है।"

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