रविवार, 31 मई 2020

First Astronaut launch by private company SpaceX : New era in space exploration. प्राइवेट कंपनी SpaceX द्वारा Astronauts को Space में भेजना : Space Industry में नए बदलाव का दौर।


First Astronaut launch by private company SpaceX : New era in space exploration.    प्राइवेट कंपनी SpaceX द्वारा Astronauts को Space में भेजना : Space Industry में नए बदलाव का दौर।

इतिहास में पहली बार किसी प्राइवेट कंपनी द्वारा 2 Astronauts को space mission में भेजा गया है। Elon Musk की कंपनी SpaceX द्वारा Falcon 9 राकेट द्वारा Crew Dragon Capsule में 2 astronauts को ISS (international Space Station) भेजा गया। 

 2011 के बाद पहली अमेरिकी धरती से किसी astronaut को space में भेजा गया है। 2011 से अब तक रूस के सोयुज राकेट से ही भेजा जा रहा था। 

USA, Russia  और चीन के सरकारी स्पेस एजेंसी  के बाद SpaceX चौथी संगठन बन गयी है जिसने यह काम कर दिखाया। 

नई और महत्वपूर्ण घटना यह नही है कि स्पेस में किसी astronauts को भेजा गया बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि किसी private company द्वारा भेजा गया है। 

जहाँ पूरे विश्व में सरकार एजेंसी space program में एकाधिकार रहा है वहीं USA की NASA द्वारा private player को जगह देना और space exploration में शामिल करना, space exploration में नए युग की शुरुआत है। 

इस कोरोना लॉक डाउन के समय भारत में भी space exploration, development और कैपेसिटी बिल्डिंग में private investment को आने की आज्ञा दे दी है। अब निजी कंपनी ISRO के facility का उपयोग करके space exploration में भाग ले सकती है। 

Private player के इस सेक्टर में आने से सरकारी एजेंसी की मोनोपोली खत्म होगी। कॉम्पिटिशन से space program cost efficient होगा। NASA जैसी मुख्य कंपनी अपने अन्य टारगेट जैसे outer space एक्सप्लोरेशन, मार्स, जुपिटर मिशन, दूसरे planet में मानव बस्ती जैसे कठिन प्रोग्राम पर फोकस कर सकती है और पूरा ध्यान और एनर्जी उस पर लगा सकती है। 
Public private partnership से space tourism का बाजार बड़ा हो सकता है। 

चूंकि space program काफी महंगे होते है , निजी निवेश से इस सेक्टर को boost मिलेगा। इसके प्रोग्राम में तेजी आएगी। 
Private company के आने से geospatial data और remote sensing data  का उपयोग बढ़ जाएगा , जिनसे उनसे होने वाला लाभ बढ़ेगा। 

अगर इस तरह का बदलाव जारी रहा तो space programme में नए लक्ष्य जल्द से जल्द ही प्राप्त हो सकते है। 

क्या पूर्ण रूप से चीनी उत्पादों (products) का बहिष्कार किया जा सकता है? Can Chinese products be completely boycotted?












क्या पूर्ण रूप से चीनी उत्पादों (Chinese products)  का बहिष्कार किया जा सकता है? 

 Can Chinese products be completely boycotted?


अगर भारत – चीन के व्यापारिक संबंधों को देखे तो चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार (trading partner) है, अर्थात भारत सबसे ज्यादा चीन के साथ ही  व्यापार (trade) करता है, उसके बाद USA और UAE है। 

लेकिन इसमें भी भारत नुकसान में है क्योंकि भारत चीन को निर्यात (export) काफी कम और आयात (import) काफी ज्यादा करता है। 2017-18 में भारत ने चीन को 16.34 बिलियन डॉलर का निर्यात (export) किया, जबकि 68 बिलियन डॉलर का आयात (import) किया। एक्सपोर्ट – इम्पोर्ट के अंतर(difference)  को ट्रेड डेफिसिट कहते है और उस साल का ट्रेड डिफिसिट 51 बिलियन डॉलर का था। 

अभी भी भारत का चीन के साथ ट्रेड डिफिसिट 50 बिलियन डॉलर के आस पास ही है।

अब अगर चीन से आयात (import) को देखा जाय तो भारत 57% आयात (import) केवल electric equipment, phone, computers, machine, engine जैसे चीजो का करता है। 

अब अगर इन्ही वस्तुओं के चीन द्वारा विश्व के सभी देशों में निर्यात (export) के आंकड़े को देखा जाय तो चीन अपने कुल निर्यात का 43%  में केवल ये उत्पाद (product)  ही शामिल है। 

ऐसा नही है कि इन वस्तुओ का चीन से आयात (import) केवल भारत करता है बल्कि पूरा विश्व करता है। इन्ही उत्पादों (Chinese products) की वजह से चीन Global Manufacturing Hub बना हुआ है। चीन का Manufacturing में 28% हिस्सा है जबकि भारत का केवल 3% हिस्सा है। 

चीन के global manufacturing hub बनने के कई कारण है। जिनमें कुछ महत्वपूर्ण है-

1. अधिकांश जटिल नई तकनीक वाले उत्पाद, जैसे स्मार्ट फ़ोन, electric vehicle, solar panel आदि में  rare earth material का प्रयोग होता है, जिसका 90% रिज़र्व और production  चीन में होता है और चीन rare earth material के व्यापार को कंट्रोल करता है। 

2. वहाँ पिछले 30 सालों में एक  शानदार business ecosystem विकसित हुआ है, जिसमें supply chain की दक्षता (efficiency) बढ़ी है। जिससे लागत में कमी आयी है और मार्जिन बढ़ा है। 

3. भारत में जहाँ cost of transportation वस्तु के मूल्य का  3 % है वहीं चीन में 1% है , जिससे लागत कम हो जाती है। 

4. चीन में भारत की तुलना में बैंक के interest rate काफी कम है। जिससे manufacturer को सस्ता लोन मिलता है और वस्तु की कीमत घट जाती है। 

5. भारत के जैसा कठोर labour law वहाँ नही है और ना ही health, safety और pollution को लेकर कड़े कानून है और ना ही उनको ठीक से लागू किया जाता है। 

6. चीन में काफी सस्ता labour उपलब्ध है।

7. चीन समय समय पर अपनी मुद्रा (currency) का undervaluation करती है ,जिससे उसको निर्यात में ज्यादा विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, और ज्यादा फायदा होता है। जबकि भारत में अगर बाजार के supply demand के आधार पर भारतीय मुद्रा का मूल्य थोड़ा भी गिर जाता है तो हमलोग परेशान हो जाते है। 

इन सभी के कारण चीन के manufactured product सस्ते पढ़ते है इसलिए बहुत सारी international companies भी वहाँ अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट डाल रखी है। 

अब हमलोग पुनः मूल प्रश्न पर आते है, क्या भारत चीन की जगह ले सकता है? या अपने चीन से होने वाले आयात (Chinese products) को कम कर सकता है?

इसका जवाब नकारात्मक (negative) नही है, ऐसा हो सकता है और इसके कई आधार भी है।

चीन में जहाँ one child policy के कारण कार्यशील जनसंख्या की औसत आयु बढ़ी है जबकि भारत में यह अधिक युवा है, इसके अलावा कार्यशील जनसंख्या चीन की तुलना में अधिक है। जिससे भारत का लेबर सस्ता और अधिक उत्पादक है। 

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है , इसे दोहन (tap) करने के लिए बहुत सारी कंपनियां भारत में मैनुफेक्चरिंग यूनिट बैठना चाहती है। बस उन्हें एक अच्छे माहौल देने की जरूरत है। इस समय भारत में research पर काफी ध्यान दिया जा रहा है जो मैनुफेक्चरिंग के लिए force का काम करेगा। 

भारत मे भी transportation के लागत में कमी के लिए water ways, double decker freight train, expressway, dedicated freight corridor बनाया जा रहा है। 

वर्तमान सरकार Make in India, आत्मनिर्भर भारत, मुद्रा लोन जैसी योजनाओ से मैनुफेक्चरिंग बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

कोरोना के कारण चीन की विश्व मे काफी किरकिरी हो चुकी है। post covid situation में बहुत सारी बड़े ब्रांड वाली international कंपनी अपनी मैनुफेक्चरिंग गतिविधियों को चीन से भारत shift कर सकती है। 

इस पूरे विश्लेषण (analysis) को देखा जाय तो near future में भारत मैनुफेक्चरिंग में चीन के बराबर खड़ा हो सकता है।

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गुरुवार, 28 मई 2020

पिछले 26 सालों के सबसे बुरा टिड्डियों का हमला: कितना खतरनाक है ये भारत के लिए! The worst locust invasion of the last 26 years: how dangerous it is for India!

पिछले 26 सालों के सबसे बुरा टिड्डियों का हमला: कितना खतरनाक है ये भारत के लिए!   The worst locust invasion of the last 26 years: how dangerous it is for India!

worst locust invasion in India
                              worst locust invasion in India


भारत बीते 26 सालों का सबसे बुरा टिड्डियों के हमले का सामना कर रहा है। 11 अप्रैल को भारत पाकिस्तान के सीमा से निकल कर पश्चिमी भारत के राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में तेजी से फैल रहा है। 

ये रेगिस्तानी टिड्डी (Desert Locust) है जो दक्षिणी ईरान से पाकिस्तान होते हुए भारत पहुँचा है। ये सभी टिड्डियों में सबसे ज्यादा विनाशकारी है। 

वैसे तो अकेली टिड्डी से इंसानों को कोई खतरा नही है लेकिन जब इनकी आबादी बढ़ जाती है तो इनका व्यवहार बदल जाता है, फिर ये खाने और प्रजनन के लिए लंबी दूरी तक सफर करने लगते है। ये एक दिन में 150 km तक सफर कर सकते है। 

 इनका समूह कई किलोमीटर लंबा हो सकता है और एक किलोमीटर में 4-8 करोड़ टिड्डियां हो सकते है। एक टिड्डी अपने वजन (2 ग्राम) जितना एक दिन में खा सकता है। अनुमान लगाया जाए तो इस तरह का समूह एक दिन में 35000 लोगो जितना खाना खा सकता है। 

फिलहाल भारत मे रबी की फसल काटी जा चुकी है, जिससे तुरंत कोई बड़ा खतरा नही है लेकिन बारिश के समय, खरीफ फसल को नुकसान पहुँचा सकती है, क्योंकि बारिश का समय इनके प्रजनन के अनुकूल होता है और आबादी तेजी से बढ़ती है।  एक टिड्डी एक बार मे 80-90 अंडे देती है और 3 महीने के जीवन काल में 3 बार प्रजनन करती है। तीन महीने में इनका समूह 20 गुना तक बढ़ सकता है। ये भारत की food security के लिए खतरा हो सकता है अगर इन्हें रोका ना जाय।

फिलहाल ये अलग अलग समूह में बंट कर अलग अलग जगहो की और बढ़ रहे है जिसे कंट्रोल किया जा सकता है। इस समय ड्रोन से पेस्टिसाइड का छिड़काव किया जा रहा है।

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बुधवार, 27 मई 2020

भारत चीन सीमा विवाद : ये कहा तक जाएगा, युद्ध या शांति।India-China border dispute: where will it go, war or peace!

 मई को करीब 250 भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के गेलवान वैली में झड़प होती है, उसके बाद 9 मई को उत्तरी सिक्किम में भी इसी प्रकार की झड़प होती है। उसके बाद से ही भारत और चीन के बीच का सीमा विवाद फिर से उभर कर सामने आता है।

वर्तमान तनाव की वजह में भारत का पूर्वी लद्दाख में दर्बुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड है। यह सड़क  गेलवान वैली से गुजरती है जहाँ चीन भारत के सड़क निर्माण के कार्य को रोकना चाहता है और LAC के पार भी अपना दावा ठोकता है। 

LAC (line of actual control) भारत और चीन के लद्दाख में अस्थायी सीमा का कार्य करता है जैसा भारत और पाकिस्तान के बीच में कश्मीर में LOC अस्थायी रूप से सीमा का निर्धारण करता है। 

इस तनाव के अगली कड़ी के रूप के प्योंगयांग झील के पास दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प और चीन द्वारा अपने सैनिकों का जमावड़ा करना रहा। 

पयोग्योंग झील 134 km लंबा झील है जिसका 40 % भारत के पास है और बाद बाकी चीन के कब्जे में है। गेलवान वैली लगभग 200 km दूर है।

इसी क्रम में चीन प्योंगयांग झील से नजदीक अपने एयरबेस में फाइटर प्लेनो को तैनात करते है। इसी बीच 25 मई को चीन के प्रेजिडेंट शी जिंगपिंग अपनी सेना को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने को कहते है, जिससे तनाव अपने चरम पर पहुँच जाता है, फिर दूरसे ही दिन चीन अपने सभी मामलों को शांतिपूर्ण बातचीत से सुलझाने की बात करता है। 

ये थी अब तक का घटनाक्रम , जहाँ से यह शुरू होता है और भारत की स्थिति वहाँ अब भी वही है जो पहले थी, अर्थात रोड बनाने का कार्य जारी है, भारतीय सैनिक एक कदम भी पीछे नही हटे है। 

यह सीमा झड़प 2017 के डोकलाम झड़प के बाद से सबसे बड़ा है। महीनों के तनाव के बाद भी डोकलाम में भी भारत अपने स्टैंड पर कायम रहा। यहाँ भी वही होने वाला है। चीन और भारत के बीच किसी भी कारण से युद्ध होने की संभावना काफी कम है, युद्ध से दोनों देशों को नुकसान पहुँचेगा  जिसे दोनों नही चाहते है। 
अब इस बात पर ध्यान देते है कि ये सीमा विवाद कैसे हुआ एवं क्यों अभी तक यह समाप्त नही हुआ है। इसे जानने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 

70 साल पहले भारत और चीन के बीच कोई सीमा नही लगती थी, भारत और चीन के बीच तिब्बत नामक देश था। भारत एवं तिब्बत के बीच मेक मोहन लाइन थी, जो दोनों देशों की सीमा का निर्धारण करती थी।  

1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और तिब्बत की पूरी की पूरी सरकार और धर्मगुरु ने वहाँ से भागकर भारत में शरण ली। तिब्बत को कब्जे करने के बाद भी चीन की विस्तारवादी नीति कम नही हुई बल्कि और बढ़ गई। 1962 में चीन ने लद्दाख के अक्साई चीन और आसाम पर हमला करके एक बड़ा भू भाग कब्जा कर लिया, तब से ही लद्दाख का एक तिहाई हिस्सा चीन के पास है। इसके बाद भी चीन पूरे लद्दाख पर अपना दावा करता है। 
भारत और चीन के सीमा विवाद को सुलझाने के लिये बैठकें होती रहती है। हाल फिलहाल में ही चीन ने सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग माना, जिस पर वह पहले अपना दावा प्रस्तुत करते थे। फिलहाल अरुणाचल प्रदेश को लद्दाख पर चीन अपना दावा ठोकते है। 


मंगलवार, 26 मई 2020

क्या भारत अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी (recession) की और बढ़ रहा है? Is India moving towards the biggest recession ever?

अगर भारत में आर्थिक मंदी (recession) का इतिहास देखा जाय, तो अब तक 3 बार भारत में आर्थिक मंदी आ चुका है, 1958, 1966 और 1980 में। इन सभी का कारण खराब मानसून और उससे उत्पन्न सूखा रहा है, जिससे कृषि (agriculture)  मुख्य रूप से प्रभावित हुई।  उस समय GDP का मुख्य एवं बड़ा हिस्सा कृषि ही था। 

1991 के आर्थिक उदारीकरण (liberalization) के बाद अब तक कोई भी मंदी नहीं आयी है, लेकिन क्या इस साल 2020 में आर्थिक मंदी (recession) आने वाली है?

भारत के top 6 इंडस्ट्रियल (औद्योगिक) राज्य, जो  भारत के 60% इंडस्ट्रियल उत्पादन का भार रखते है , वहाँ की मुख्य इंडस्ट्रियल एरिया या तो रेड जोन में है या ऑरेंज जोन में है। दो महीने के लॉक डाउन ने औद्योगिक उत्पादन पर बुरा असर डाला। शहरी अर्थव्यवस्था की दौड़ पर लगाम लग गई। आर्थिक गतिविधि रुकने से लोगो की आय (इनकम) कम हुई,  उत्पादों (products) की डिमांड कम हुई। 

रिज़र्व बैंक कहता है कि भारत की GDP विकास दर 2020-21 में नकारात्मक रहने वाली है। भारत की मुख्य रेटिंग एजेंसी CRISIL कहती है कि 2020-21 की भारत की GDP विकास दर 5% तक सिकुड़ सकती है, अर्थात, अगर 2019-20 में भारत की GDP 100 रुपये थी तो 2020-21 में 95 रुपये हो जाएगी। 

भारत के GDP के विकास दर में कुछ लगाम तो लगने वाली है पर इसका असर कितना पड़ेगा, इसे जानने के लिये हमें थोड़ा डिटेल में जाना होगा। किसी भी अर्थव्यवस्था को मुख्यता तीन सेक्टर में बांटा जाता है, कृषि (agriculture) , विनिर्माण एवं उद्योग(manufacturing & industry)   और सर्विस। कृषि GDP में लगभग 15% का योगदान देते है और 53% आबादी कृषि पर निर्भर है इसी तरह इंडस्ट्री 23% GDP में योगदान देते है और 22% आबादी निर्भर है एवं सर्विस का सबसे ज्यादा 62% योगदान है और 25% आबादी निर्भर है। 

अब इस कोरोना संकट की बात की जाय तो सबसे ज्यादा प्रभावित मैनुफेक्चरिंग और इंडस्ट्री रही है उसके बाद सर्विस सेक्टर में टूरिज्म, ट्रांसपोर्टेशन, मीडिया आदि रही है। 

इस संकट में तो कुछ मैनुफेक्चरिंग सेक्टर जैसे फार्मा (मेडिसिन) और मेडिकल इक्विपमेंट्स सेक्टर में और तेजी आई है। 

कृषि कार्य पहले की तरह ही जारी है। सर्विस सेक्टर, खास कर IT और कम्युनिकेशन उसी तरह से अपना काम कर रही है, लॉक डाउन में वर्क फ्रॉम होम हो रहा है। 

चीन से नाराज होकर बड़ी बड़ी वैश्विक कंपनियां अपनी मैनुफेक्चरिंग यूनिट को चीन से भारत शिफ्ट करना चाहती है। 
बैंक  अपने इंटरेस्ट रेट को कम कर के लोन को सस्ता बना रहा है और सरकार उस लोन को हर जरूरतमंद व्यक्ति तक उपलब्ध करवाने की कोशिश कर रही है। 

अब आप किस निष्कर्ष में आते है, यह मंदी (recession) कितने दिन चलेगी और कितनी गंभीर है?

मेरे अनुसार, जैसे ही हम कोरोना संक्रमण को कंट्रोल कर लेते है अर्थात उसकी वृद्धि दर को कम या स्थिर कर देते है तो उसके 1-2 महीने में ही अर्थव्यवस्था (economy) रफ्तार पकड़ लेगी और इस financial year के अंतिम दो तिमाही पॉजिटिव ग्रोथ रेट दिखाएगी। 

आपके क्या विचार है, कृपया कमेंट कर बताये। 



सोमवार, 25 मई 2020

क्यों सबसे ज्यादा प्रवासी मजदुरो में बिहार के मजदूर है? Why Bihar has the highest number of migrants laborers?

क्यों सबसे ज्यादा प्रवासी मजदुरो में बिहार के मजदूर है? Why Bihar has the highest number of migrants laborers?

Bihar has the highest number of migrants laborer
Bihar has the highest number of migrants laborer
इस कोरोना संकट में प्रवासी मजदुरो पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा है। इन प्रवासी मजदुरो में सबसे बड़ी संख्या बिहार के मजदुरो की है। फिलहाल सभी अपने पैतृक निवास जाना चाहते है।
कई कारण है जिसके चलते बिहार को लोगो को रोजगार के लिए अन्य राज्य जाना पड़ता है। 

बिहार की जनसंख्या घनत्व काफी ज्यादा है, जहाँ भारत की औसत जनघनत्व 382 व्यक्ति प्रति स्क्वायर km है वही बिहार में 1102 है। चूंकि संसाधन सीमित है,  और आबादी अधिक होने से संसाधनों पर ज्यादा बोझ पड़ता है इसलिए लोगो को अपने राज्य छोड़ कर बाहर निकलना पड़ता है। 

अधिक आबादी के कारण कृषि खेतो के आकर छोटे छोटे है जिससें कम आय होती है, इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगो के पास खेती की कोई जमीन नही है और उन्हें मजदुरी करना पड़ता है। 

केरल में भी जनघनत्व बिहार के समान है लेकिन वहाँ के हालात बिहार से काफी अच्छे है क्योंकि केरल भारत का सबसे अधिक साक्षरता एवं अधिक skilled वाला राज्य है और बिहार सबसे कम। educated एवं skilled होने के कारण केरल के लोगो को विदेशो एवं भारत के अन्य हिस्सों में भी अधिक सैलरी वाली जॉब मिलती है, जबकि कम साक्षरता होने के कारण बिहार के लोगो को मजदुरी करना पड़ता है। 

केरल में बागवानी, खास कर रबड़, मसाले, कॉफी, चाय, नारियल आदि से अच्छी एवं नियमित आय(income) होती है जबकि बिहार में बागवानी का अभाव है।

केरल भारत का मुख्य टूरिज्म डेस्टिनेशन है जिससे लोगो को रोजगार मिलता है और आय बढ़ती है, जबकि बिहार भारत के लोगो के लिए last choice है टूरिज्म के लिए, जबकि बिहार बौद्ध धर्म का केंद्र है।  इसका मुख्य कारण पर्यटन के जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे, अच्छे हॉटेल, ट्रांसपोर्टेशन के साधन की कमी है, इसके अलावा law & order की कमजोर स्थिति लोगो को जाने के लिए प्रेरित नही करती है। 

बिहार अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा बाढ़ से पीड़ित है जिससे घर, फसल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बर्बाद होती है जिससे लोगो एवं राज्य की आय में अतिरिक्त बोझ पड़ता है। 

बिहार में जातिवादी राजनीति में विकास से पहले जातीय पहचान रही है जिससे हर जाति वालो को नुकसान हुआ है, और हर जाति के लोगो को मजदूरी करने बाहर जाना पड़ा है। 

1970 के दशक में दो नई समस्याए उतपन्न हुई बिहार में, एक वामपंथ का असर बढ़ने लगा दूसरा अपराध बढ़ने लगा, जिससे धीरे धीरे वो फैक्टरी ही बंद हो गयी, फिर लोगो को रोजगार के लिए दूसरे स्थान में पलायन करना पड़ा। इसका एक बड़ा उदहारण डालमियानगर है, जो एक बड़ा इंडस्ट्रियल एरिया हुआ करता था, अब भुतहा शहर बन चुका है। 

1970 के बाद से बिहार के लोगो की अभिवृति में भी काफी परिवर्तन आया है लोगो मे entrepreneurship  में कमी आयी है और सरकारी नौकरी के पीछे भागने लगे। 

entrepreneurship में कमी के कारण वहां के निवासी नए उद्यमिता से पीछे हटने लगे एवं अन्य राज्य के उद्योगपति law & order के कारण कोई भी वहाँ नया निवेश नही करने लगे। 

बिहार का भुअवरुद्ध राज्य होने के कारण शिपिंग, पोर्ट, फिशिंग आदि से होने वाले बिज़नेस अवसर का लाभ नही मिला। 

बिहार के पढ़े लिखे युवा अच्छे भविष्य के लिए बाहर निकल गए , जिससे उसकी बुद्धिमता एवं कार्य अन्य राज्यो को और बेहतर बनाने में ही खप गया। यह एक तरह से brain drain की स्थिति है, जिसका दुष्परिणाम पिछड़ापन के रूप में सामने आया।

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रविवार, 24 मई 2020

कोई भी मेडिसिन तैयार होकर मार्केट में कैसे आता है?


कोई भी मेडिसिन तैयार होकर मार्केट में कैसे आता है?


किसी भी मेडिसिन को laboratory से मार्केट में आने में करीब करीब 10 से 12 साल लगते है। 5000 में 5 ड्रग ही pre clinical trial से human trial में आ पाते है और इन 5 ड्रग्स में 1 ही ड्रग मार्किट में आ पाता है। 

मेडिसिन के लिए 3 गुणों का होना अनिवार्य है, उसका प्रभावी (effective) होना, सुरक्षित होना और मरीजो को उपलब्ध होना। 
ये तीन विशिष्ट गुण किसी मेडिसिन में होने चाहिये, इसके लिए एक लंबी प्रक्रिया अपनायी जाती है। अब इस प्रक्रिया को detail में देखते है। सबसे पहले कोई भी मेडिसिन रिसर्च संस्थान किसी बीमारी के लिए टारगेट को ढूंढती है, यह मुख्यता वायरस या बेक्टिरिया के प्रोटीन होते है। उसके बाद ड्रग डिस्कवरी का स्टेज आता है, इसमें यह टेस्ट किया जाता है कि कौन सा केमिकल कंपाउंड उस टारगेट के रोकने एवं समाप्त करने में प्रभावी है।

प्रभावी केमिकल कंपाउंड मिल जाने के बाद pre clinical trial होता है, इसमें लैबोरेटरी और जानवरों पर trial होता है । इसमें 3 साल लगते है ।

Pre Clinical trial सफल होने पर clinical trial के लिए Drug Regulatory में आवेदन किया जाता है। मंजूरी मिलने पर clinical trial आरंभ होता है। 

इसके 3 फेज है। फेज 1 में 20-80 स्वस्थ्य स्वयंसेवकों (volunteers) पर एक साल तक trial किया जाता है, एवं आंकड़े इकठ्ठे किये जाते है। पॉजिटिव रिपोर्ट आने पत फेज 2 में 100-300 मरीजो पर 2 साल तक उस दवा का ट्रायल किया जाता है। फिर इसके बाद फेज 3 में बड़े स्तर पर हॉस्पिटल एवं क्लीनिक्स में 100-3000 मरीजो पर 3 साल तक ट्रायल किया जाता है। अच्छे रिजल्ट आने पर नई मेडिसिन के लिए एप्लीकेशन किसी भी देश के drug controller के पास की जाती है। 
इसके बाद फिर से फेज 4 की ट्रायल की जाती है जिसमें अन्य अतिरिक्त डाटा, सुरक्षा एवं साइड इफेक्ट्स आदि के आंकड़े इकठ्ठे किये जाते है। 

सारे ट्रायल के रिजल्ट एवं आंकड़े देखने के बाद उसके बीमारी में प्रभावी (effective);एवं सेफ होने पर ही ड्रग  रेगुलेटरी या कंट्रोलर उस मेडिसिन के लिए मंजूरी देता है एवं उसके बाद ही कोई ड्रग मेडिसिन शॉप में आती है।

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शनिवार, 23 मई 2020

Sonu Sood सोनू सूद

इस कोरोना संकट में जहाँ कई सारी हृदय विदारक तस्वीर सामने आ रही है वही एक तस्वीर ऐसी भी है मन को प्रफुल्लित कर रही है, वह है अभिनेता सोनू सूद का ट्विटर हैंडल। 

जी हाँ, वही सोनू सूद, जिसने दबंग मूवी में सलमान खान को अपनी गठीले बॉडी से कड़ी टक्कर दी थी। 

सोनू सूद जी हर उस व्यक्ति को मुम्बई से उनके गृहराज्य भेजने में मदद कर रहे है जो कष्ट में है और अपने घर जाना चाहते है। वो उन सभी के लिए पास का इंतजाम, वाहन की व्यवस्था एवं अन्य सभी प्रकार के इंतजाम कर रहे है। ट्विटर पर वो जिस तरह से response कर रहे है वो काफी शानदार है एवं कष्ट से घिरे व्यक्ति में नई ऊर्जा का संचार कर रहे है। 

शुक्रवार, 22 मई 2020

क्या विदेशी कंपनी का भारत में निवेश (investment) देश को गुलाम बनाने जैसा है ?Is investment of a foreign company like enslaving the country?

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क्या विदेशी कंपनी का भारत में निवेश (investment) देश को गुलाम बनाने जैसा है ?Is investment of a foreign company like enslaving the country?

इस विषय को समझने से पहले थोड़ा दुसरे देश से आने वाले निवेश (investment) को समझ लेते है। कोई विदेशी व्यक्ति या institution भारत में दो प्रकार से invest कर सकते है, पहला FII (Foreign Institutional Investment), जिसमे भारत के शेयर मार्केट मे इन्वेस्ट किया जाता है, इस धन को कभी भी निकाला जा सकता है। दूसरे प्रकार के investment में FDI (Foreign Direct Investment ), इसमें विदेशी निवेशक द्वारा सीधे भारत में अपने पैसे को कोई नई कंपनी खोल कर या किसी कंपनी में सीधे हिस्सेदारी खरीदकर कर निवेश करते है और partnership या ownership ले लेते है ।

भारत मे बहुत सारी विदेशी कंपनियां है, जैसे - हिंदुस्तान लीवर, मारुति सुजुकी, जॉनसन &  जॉनसन , वोडाफोन आदि। उसी प्रकार बहुत सारी भारतीय कंपनियां भी विदेशो में निवेश कर रखी है, जैसे - टाटा मोटर्स, एयरटेल आदि। 

अगर भारत मे किसी विदेशी  product की मांग (demand) है और यदि वह कंपनी भारत मे उत्पादन शुरू करती है तो इससे भारत को ही कई प्रकार से फायदा है, जैसे- प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार उतपन्न होना, GDP बढ़ना, आय बढ़ना, आदि। हमें apple के iphone आयात (import) करने से नुकसान है लेकिन यदि apple कंपनी iphone का उत्पादन भारत में शुरू कर देती है तो हमे फायदा है। 

इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में यह उम्मीद करना कि कोई भी देश हर जरूरत की समान बनाने लगे और किसी भी प्रकार का आयात ना करे, वेबकूफ़ी होगी। कोई भी देश WTO के नियमो के विपरीत आयात को प्रतिबंधित नही कर सकता है अन्यथा उसे अन्य देशों एवं संगठनों से प्रतिबंद्ध का सामना करना पड़ेगा और उसका निर्यात भी बंद हो जायेगा। 
इस समय किस देश का पैसा invested है यह उतना मायने नही रखता जितना कि उस निवेश से कितने रोजगार उतपन्न होंगे, GDP कितनी बढ़ेगी, आय कितना बढ़ेगा , मायने रखता है। 

सरकार किसी भी FDI को मंजूरी देने से पहले देश की आर्थिक एवं रणनीतिक सुरक्षा को भी ध्यान रखता है । अभी हाल में ही फेसबुक के रिलायंस जियो में 10% निवेश को आसानी से मंजूरी मिल जाती है लेकिन चीन की किसी कंपनी  द्वारा HDFC बैंक में निवेश को नामंजूर कर दिया जाता है। उदहारण का तातपर्य यह दिखाना है कि सरकार कितनी सतर्क है विदेशी निवेश के मामले में। 
विदेशी निवेश हो जाने के बाद यदि वह निवेश देश की अखंडता एवं आंतरिक शांति के लिए खतरा बनता है तो उसे राष्ट्रीयकृत (nationalised) किया जा सकता है या विदेशी निवेशकों को देश छोड़ कर जाने को कहा जा सकता है। 

विदेशी निवेशक अपने साथ केवल धन नही लाती है बल्कि नई तकनीक, कार्यकुशलता एवं नया बाजार भी लाती है। जापानी कंपनिया भारत मे कार्य करते हुए किसी भी प्रकार का घूस नही देती है। ऐसे बहुत सारे उदहारण भरे पड़े है। 



मंगलवार, 19 मई 2020

क्यों सरकार लाभ देने वाली सरकारी कंपनियो को बेचना चाहती है ? Why does the government want to sell profitable comapanies?


क्यों सरकार लाभ देने वाली सरकारी कंपनियो को बेचना चाहती है ? Why does the government want to sell profitable comapanies?

अभी हाल में ही केंद्र सरकार द्वारा देश की दूसरी सबसे बड़ी Oil रीफाइनरी कंपनी BPCL के पूरे 52.98% stake बेचने का मुद्दा चर्चा में हैं। BPCL का भारत मे एक चौथाई मार्केट में कब्जा है । ­­­BPCL रीफाइनरी के साथ साथ ऑइल डिस्ट्रिब्यूशन में भी शामिल है । अगर सरकार के BPCL में वर्तमान  मूल्य की बात करे तो करीब करीब 36 हजार करोड़ रुपये होते है ।

अब लोगो के मन में यह प्रश्न उठते हैं कि जब कोई सरकारी कंपनी लाभ में है तो उसे बेचा क्यों जाय ? इसके अलावा कई लोग पूर्ण रूप से निजीकरण का विरोध  करते है ।

इन सभी प्रश्नों के जवाब जानने के लिए हमे पीछे जाना होगा, भारत मे 1991 से आर्थिक सुधार आरंभ (Economic Reform) हुआ, जीसमे भारत की आर्थिक नीति LPG अर्थात liberalization, Privatization, Globalization पर की और बढ़ने लगा। अब अगर 1991 से तुलना करे तो देखेंगे की गरीबो की संख्या मे कमी आई है, लोगो की आय बढ़ी है , लोग गरीबी से निकल कर माध्यम वर्ग मे शामिल हुए है। देश की आर्थिक स्तिथि मजबूत हुई है । 1985 मे अमेरिका भारत से GDP के अनुसार  18 गुणी बड़ी अर्थव्यवस्था थी और 2019 मे यह गैप काफी कम हुआ है अभी अमेरिका भारत से 7 गुणा बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत अब विश्व की 5वी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई है।

अब अगर सरकार के मूल कार्यो पर दृष्टि डाली जाय तो सरकार का कार्य बिज़नेस करके लाभ नहीं कमाना है बल्कि सभी लोगो को आर्थिक क्षेत्र मे शामिल करके यह सुनिश्चित करना है कि सभी बाज़ार एवं देश के नियमो का सही से पालन करे, अर्थात एक regulatory कि भूमिका निभाना है ।

सरकार disinvestment (विनिवेश) से प्राप्त राशि का उपयोग आधारभूत ढांचे एवं सामाजिक क्षेत्र जैसे शिक्षा, स्किल आदि मे निवेश कर सकते है जिससे लोगो कि क्षमता मे वृद्धि होगी । सरकार को वैसा माहौल देना है जिससे लोगो मे entrepreneurship आये, छोटी कंपनियां बड़ी होकर वैश्विक हो जाये। 

इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दौड़ मे हर कंपनीयो को आक्रामक रूप से टेक्नालजी, मैनपावर एवं नए क्षेत्रो मे निवेश करना पड़ता है ताकि अन्य कंपनियो से आगे बनी रहे । जब तक किसी सरकारी कंपनी का किसी सैक्टर मे मोनोपोली रहता है तब तक तो सब ठीक रहता है, कंपनी लाभ मे रहती है  लेकिन जैसे ही अन्य कंपनी  उसी सैक्टर मे आते है तो सरकारी कंपनी प्राइवेट कंपनी से पिछड़ जाते है । इसका एक उदहारण BSNL है, वैसे सरकार को अर्थव्यवस्था के उस क्षेत्र मे निवेश करना चाहिए जहां कोई अन्य प्राइवेट प्लेयर निवेश नहीं कर रहे है एवं वह सैक्टर लोगो के लिए काफी महत्वपूर्ण है और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक  है  उसके अलावा सभी सैक्टर को प्राइवेट प्लेयर पर छोड़ देना चाहिए जहां supply एवं demand पर मूल्य निर्धारित होता है बस सरकार को रेग्युलेटर की भूमिका मे बाज़ार पर दृष्टि रखनी चाहिए ।

रविवार, 17 मई 2020

सरकार गरीबी दूर करने के लिए अधिक नोट क्यों नही छापती है? Why does the government not print more notes to alleviate poverty?
















सरकार गरीबी दूर करने के लिए अधिक नोट क्यों नही छापती है?

Why does the government not print more notes to alleviate poverty?

सबसे पहले तो यह समझना होगा कि करेंसी नोटो  का काम क्या है। करेंसी नोटो के आने से पहले खरीद विक्री Barter system से होती थी, जैसे किसी को चावल बेचना है और नमक खरीदना है उसी प्रकार अन्य व्यक्ति को चावल खरीदना है और नमक बेचना है तो ये दोनों आपस मे व्यपार कर सकते है। यहाँ एक limitation है अर्थात सब इस व्यापार में शामिल नही हो सकते है या काफी मुश्किलों से व्यापार कर सकते है।

करेंसी नोटो का कार्य खरीद बिक्री को आसानी से सम्पन  करवाना है। 

अब प्रश्न यह उठता है कि सरकार करेंसी नोट या मुद्रा जारी करती है और सरकार गरीबी भी हटाना चाहती है तो क्यो सरकार अधिक मात्रा में करेंसी नोट छाप कर गरीबो में बांट देती है। 

सरकार ऐसा क्यों नही करती है, इसे एक example से देखते है । मान लिया जाय कि किसी अर्थव्यवस्था में लोगो के पास 1000 रुपये की वस्तु है और उसी अर्थव्यवस्था में लोगो के पास 1000 रूपए है। अगर सरकार लोगो को अधिक नोट छाप कर और 1000 रुपये दे देती है तब लोगो के पास 2000 रुपये हो जाएंगे लेकिन वस्तु तो 1000 रुपये का ही रहेगा, तब वस्तु का मूल्य बढ़ जाएगा। इससे महंगाई बढ़ जाएगी। अर्थात  कोई फायदा नही होगा। 

अब प्रश्न यह उठता है कि किसी अर्थव्यवस्था में कितनी मात्रा में मुद्रा होनी चाहिए। इसका एक सिंपल फार्मूला है, बाजार में जितनी मूल्य की वस्तु (product) एवम सेवा (service) है उतनी मात्रा में मुद्रा होनी चाहिए। 


हाल के वैश्विक घटना में जिम्बावे और वेनेजुएला का उदहारण है जहाँ सरकार ने जरूरत से ज्यादा नोट छापने से वहाँ इतनी महंगाई बढ़ गयी कि टोकरी भर कर नोट देने पर मुट्ठी भर समान मिलता था। 

क्या होता है आर्थिक पैकेज?What is an economic package?

























क्या होता है आर्थिक पैकेज?What is an economic package?


वैसी मौद्रिक या राजकोषीय नीति जो अर्थव्यवस्था में नई जान डालती है, अर्थात सरकार द्वारा खराब अर्थव्यवस्था में पैसे का flow बढ़ाना।


जब भी किसी अर्थव्यवस्था या बाजार में मांग (demand) घटती है, तब उत्पादन घटता है, आय (इनकम) में कमी आती है, बेरोजगारी बढ़ती है, लोगो की पूंजी एवं बचत में कमी आती है, जिससे गरीबी बढ़ती है।  इसे ही रोकने के लिए सरकार एक बड़ी धनराशि अर्थव्यवस्था में डालती है, जिससे लोगो को पूंजी मिलती है , क्रय शक्ति बढ़ती है और फिर से अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाती है। 

अभी हाल में ही भारत के प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। यह पैकेज अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र एवं संमाज के आर्थिक रूप से  निचले तबको को विशेष रूप से प्रोत्साहन देता है। 

आर्थिक पैकेज ऐसा नही होता है की पूरी रकम हर व्यक्ति के खाते में डाल दी जाएगी , बल्कि ऐसी व्यवस्था की जाती है कि हर व्यक्ति ईस बुरी परिस्थिति से अच्छे से  बाहर निकल जाए और पुनः अपना व्यवसाय करने लगे।

प्रश्न अब यह उठता है कि इतने पैसे कहा से आएंगे?

देखा जाय तो इस पैकेज का मुख्य हिस्सा बैंक द्वारा लोन देकर पूरा किया जाना है जिसपर सीधे सरकार पर कोई बोझ नही पड़ता है। अन्य बचे हुए हिस्से को सरकार अपनी जमा से, गैर जरूरी खर्च को कम करके, कुछ वस्तुओ में टैक्स बढ़ा कर पूरा कर सकती है। फिर भी अगर जररूत पूरी नही होती है तब सरकार विश्व बैंक या IMF से उधार ले कर पूरा कर सकती है।



शनिवार, 16 मई 2020

कितना महत्वपूर्ण है मास्क कोरोना से लड़ने में? – How important is the mask in fighting corona?


कितना महत्वपूर्ण है मास्क कोरोना से लड़ने में? – How important is the mask in fighting corona?


कोरोना वायरस श्वशन तंत्र (Respiratory system) को संक्रमित करता है, respiratory disease होने के कारण यह एक मनुष्य से दूसरे में तेजी से फैलता है।

जब भी हम खाँसते , छींकते या बोलते है तो श्वशन तंत्र अर्थात नाक, मुँह से काफी छोटे छोटे droplets (बूंदे) निकलते है , अगर कोई कोरोना से संक्रमित व्यक्ति खासे, छीके या बात करे तो उनसे निकले droplets में कोरोना वायरस रहते है। यदि सामने वाला व्यक्ति अगर मास्क नही पहना है तो उसके संक्रमित होने की संभावना बढ़ जाती है।

मास्क संक्रमित एवं साधारण व्यक्ति सभी को पहनने की आवश्यकता है । मास्क पहने रहने से वायरस व्यक्ति के नाक एवं मुँह के जरिये प्रवेश नही कर सकता है। हवा में भी काफी समय तक वायरस जीवित रहता है, इसलिए बाहर निकलने पर हमेशा मास्क पहनना चाहिए।

 एक रीसर्च के अनुसार साधारण सर्जिकल मास्क 68% तथा N95 मास्क 98% प्रभावी है संक्रमण को रोकने में, यदि वो अच्छे सामग्री से बना हो और चेहरे में अच्छे से फिट हो।

मास्क ना केवल वायरस बल्कि बैक्टीरिया, धूल कण, प्रदूषण आदि से भी हमारा बचाव करता है। 

Brief History of Jews

जब जीजस क्राइस्ट को क्रॉस पर चढ़ाया गया था, उस समय जेरूसलम रोमन साम्राज्य के अधीन एक यहूदी (jews) राज्य था। उस समय का रोमन साम्राज्य, ईसाई होली रोमन साम्राज्य नही था, रोमन उस समय अपोलो, जुपिटर आदि को पूजते थे। 

जीजस के समय यहूदी(Jews) मुख्यतः जेरूसलम के आस पास के क्षेत्रों में रहते थे, जिसे इजराइल कहा जाता था। जब 66 AD से  135 AD के बीच रोमन और यहूदियों में संघर्ष प्रारंभ हुआ, jews के विद्रोह को कुचल दिया गया। जिसमे यहूदियों के एकता खत्म करने की कोशिश की, जेरुसलम को बर्बाद और jews के मंदिरों को तोड़ दिया गया, उनके राष्ट्रीयता को तोड़ने के लिए उस का नाम बदल कर सिरिया फेलिस्तीना कर दिया, jews को जेरूसलम में जाना प्रतिबंधित कर दिया।

इसके बाद बचे खुचे jews Meditarean sea(भूमध्य सागर) के चारो और बसे शहरों में बसने लगे। वहाँ के व्यपारिक केंद्रों में धीरे धीरे मुख्य व्यपारी बनने लगे। सामंतवाद (knightnood) के दौर में जहाँ यूरोप में किसानों की स्थिति बहुत ही बदतर थी, वही jews व्यापार के दम पर अपनी अच्छी स्थिति कायम कर ली थी। धीरे धीरे यूरोप के हर शहरों पर jews बस चुके थे। 

जब यूरोप में चर्च का प्रभाव बढ़ने लगा और जब पूरा यूरोप ईसाई बन गया, तब यूरोप में धर्म के आधार पर यहूदियों को नफरत झेलना पड़ा। जीजस क्राइस्ट को सूली में चढ़ाने का बदला वहाँ बसे यहूदियों से लिया जाने लगा, जबकि जीजस खुद यहूदी परिवार के थे। मध्यकाल में यूरोप के कई जगहों में यहूदियों को मारा गया, भगाया गया और इसकी चरम परिणिती दूसरे विश्व युद्ध मे होलोकॉस्ट के रूप में देखने को मिली।

इस बीच, जैसे जैसे रोमन साम्राज्य ईसाई बनते गए, जेरूसलम ईसाइयों का पवित्र स्थान बन गया। वहाँ ईसाई बसने लगे। लेकिन जब मुस्लिम अरब शासक एक शक्ति के रूप में उभरे, जेरूसलम पर कब्जा करने की कोशिश करने लगे। जेरूसलम के आस पास तो मुस्लिमो ने कब्जा जल्दी ही कर लिया, पर जेरूसलम को जीतने में काफी समय लगा। इधर पोप के अधीन (11वी सदी से 15 वी सदी) ईसाई राज्य जेरूसलम को जीतने के लिए क्रुसेड (धर्मयुद्ध) करने लगे,कई बार जीतने में सफल रहे लेकिन अंततः ऑटोमन साम्राज्य के उदय और कांस्टेण्टिनोपोल के पतन से ईसाई चुनौती समाप्त हो जाती है। इस समय सिरिया फिस्टिनीया में अरबी मुसलमानो की आबादी में वृद्धि होती है, ये स्तिथि प्रथम विश्वयुद्ध तक बनी रहती है। 

द्वीतीय विश्वयुद्ध के बाद सिरिया फेलिस्तीन का क्षेत्र ब्रिटेन और उसके सहयोगी के कब्जे में आ जाता है, इसके बाद पूरे विश्व के jews ब्रिटेन और USA के सहयोग से उस क्षेत्र में बसने लगते है,जिसे वर्तमान में इजराइल कहा जाता है। करीब करीब 2000 साल के बाद फिर से jews राष्ट्रीयता उभरती है।

 जहाँ इस्लाम और ईसाई धर्म के बढ़ते प्रभाव से विश्व के कई रिलिजन समाप्त हो गए है या समाप्त होने की स्थिति में है, वही यहूदियों के यह संघर्ष और जिजीविषा उनको एक पहचान और एक महत्वपूर्ण स्थान देता है।

Druze Religion

द्रुज धर्म मुस्लिम शिया के एक सेक्ट इस्माइली के मूल तत्वो को स्वीकार करता है एवं उनसे  काफी मिलता जुलता धर्म है लेकिन मुस्लिम से अलग है । हमज़ा इब्न अली इब्न अहमद ने 11 वी सदी मे इस धर्म की स्थापना की एवं Druze धर्म के प्रारम्भिक साहित्य की रचनाकार थे।  हमज़ा ईरान के खुरासान प्रांत के रहने वाले थे।

Druze युद्धप्रिये पर्वतीय लोग है एवं मुख्य रुप से सीरिया, लेबनान, जोर्डन एवं इस्राइल तक सीमित है। इनकी कुल आबादी 8-10 लाख के आस पास है ।

क्रूसेड के समय मुस्लिमो के सहयोगी थे लेकिन जेहाद के विरुद्ध ओटोमन राज्य के विद्रोह करते रहे है ।

Druze ईसा मसीह को भी ईश्वर का अवतार मानते है एवं एकेश्वरवाद मे विश्वास रखते है। आत्मा एवं शरीर के द्वैत को स्वीकार करते है और साथ साथ हिन्दुवों की तरह पुनर्जन्म एवं आत्मा के एक शरीर से दुसरे शरीर मे प्रवेश को स्वीकारते है लेकिन हिन्दुवों और बौद्धों से अलग केवल मुनुष्य की आत्मा का पुनः मनुष्य शरीर धारण करने की मान्यता को स्वीकारता है जबकि हिन्दुवों एवं बौद्धों मे आत्मा किसी भी प्रकार के जीव के शरीर को धरण कर सकती है ।

इनके प्रार्थना गृह को khalwat कहा जाता है । इनमे दूसरे संप्रदाय मे शादी करना सख्त माना है । ये धर्म  परिवर्तन से दूर रहते है ।

पारसी धर्म, एक संक्षिप्त परिचय

पारसी धर्म को जोरोस्त्रीयन भी कहते है इसके संस्थापक जरथुर्ष्त है । पारसी पुरातन जीवित धर्म मे से एक है। इसकी कुल आबादी एक से सवा लाख के आस पास है जिसमे भारत मे 70% है । भारत मे टाटा, वाडिया  परिवार पारसी है ।

पारसी धार्मिक समूह फारस जिसे परसिया भी कहा जाता था, वर्तमान मे जिसे ईरान कहा जाता है, के निवासी थे। छठी सदी ईस्वी तक पारसी वहाँ का राजधर्म था, अरबी मुस्लिमो से हार के बाद परसियों ने भारत मे शरण ली ।

पारसी एक ईश्वर मे विश्वास करते है जिन्हे आहुरमज्दा कहते है , इसके अलावा एक विपरीत गुणो वाले अहिरिमन की भी मान्यता है । पारसी यह मानते है कि आहुरमजदा और अहिरिमान के बीच निरंतर  संघर्ष चल रहा है जिस के कारण संसार मे सुख और दुख है, लेकिन एक दिन आहुरमजदा अहिरिमन को हरा देगा, तब संसार से दुख समाप्त हो जाएगा।

हिन्दुवों, बौद्धों की तरह मसीहावाद मे विश्वास करते है, अर्थात भविष्य मे संकट के समय ईश्वर खुद को प्रकट करेंगे । ईसाइयो एव मुस्लिमो की तरह judgment day मे विश्वास करते है ।

पारसी अग्नि को पवित्र मानते है उसे ईश्वर के पुत्र के समान मानते है । इनके पुजा स्थल को fire temple कहते है । पारसी अपने नए वर्ष को नवरोज के रूप मे मनाते है । यह 3000 साल पुराना संस्कृति है ।

मृतको का  अंतिम संस्कार इनका सबसे अनूठा है, ये tower of silence मे मृत शरीर को गिद्धो के भोजन के लिए छोड़ देते है ।


साहित्य में दर्शन

प्रेमचंद रचित "गोदान" में जब खन्ना की चीनी मिल जल जाती है तब उसकी पत्नी उसे समझाती है और कहती है, "तुम इसे विपत्ति समझते ही क्यों हो? क्यों नहीं समझते, तुम्हे अन्याय से लड़ने का अवसर मिला है। मेरे विचार से तो पीड़क होने से पीड़ित होना कही श्रेष्ठ है। न्याय के सैनिक बन कर लड़ने में जो गौरव, जो उल्लास है, क्या उसे इतनी जल्दी भूल गए?"

वैसे तो संपूर्ण  उपन्यास जीवन दर्शन है, पर ये पंक्तियां कुछ विशेष है जो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित करती है। अगर रावण का अन्याय और अधर्म ना होता तो आज राम का नाम भी ना होता। इसलिए विपत्ति आना भी एक मौका है , कुछ लोग विपत्ति में टूट जाते है आज संघर्ष छोड़ देते है, और कुछ लोग सामना करते है, और निखरते है, विजेता कहलाते है।

शरद ऋतु

मुझे सबसे सुहावनी ऋतु शरद ऋतु लगती है, मानसूनी हवाएं लौटने लगती है और बारिश होना बंद हो जाती है, रातो में ठण्ड बढ़ने लगती है। दिन और रात बराबर होने लगते है। वैसे तो शरद ऋतु वर्षा ऋतु के उत्तराध आश्विन और कार्तिक महीने को माना जाता है परन्तु सबसे बेहतरीन समय इस मौसम का नवरात्र से दीपावली और छठ पूजा तक का होता है जब दिन में भी सूर्य के किरणों का तीव्रता कम होने लगती है, और हाँ, त्योहारों के कारण चेहरा प्रदीप्तमान रहता है। त्योहारों का आनंद इस मौसम के कारण कई गुना बढ़ जाता है। इस समय का मुझे वेसब्री से इंतजार रहता है।

शरद् ऋतु के सुहावने मौसम में ऐसा कोई सरोवर नहीं है जिस में सुन्दर कमल न हों, ऐसा कोई पंकज नहीं है जिस पर भ्रमर नहीं बैठा हो, कहने का आशय है कि सभी सरोवर कमल के फूलों से ढक जाते है और उसपर भँवरे मंडराते हैं।

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में शरद ऋतु का गुणगान करते हुए लिखा है - बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

अर्थात हे लक्ष्मण! देखो वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने कास रूपी सफेद बालों के रूप में अपना वृद्घावस्था प्रकट किया है। 

कुछ इसी तरह का वर्णन कालिदास ने ऋतु संहारम में किया है, उसके अनुसार 'लो आ गई यह नव वधू-सी शोभती, शरद नायिका! कास के सफेद पुष्पों से ढँकी इस श्वेत वस्त्रा का मुख कमल पुष्पों से ही निर्मित है और मस्त राजहंसी की मधुर आवाज ही इसकी नुपूर ध्वनि है।"

सपने Dreams

सपने बड़े नहीं, बल्कि सपने खूबसूरत होने चाहिए। यहाँ खूबसूरत थोड़ा सा अमूर्त (abstract) व व्यक्तिपरक (subjective) है, जिसका अर्थ हर एक के लिए अलग हो सकता है। मेरे लिए खूबसूरत अनुभव की वस्तु है। वैसा अनुभव जो आपको हर समय आनंदित करता हो। जिसके होने से आपके जीवन मे कोई दुःख शेष नही रहता है। जिसे पा लेने से लगता है कि और कुछ पाने की जरूरत नही है, बस यही जिंदगी भर साथ रहे।