सोमवार, 16 मई 2022

क्यों भारतीय रुपए की कीमत डॉलर की तुलना में कम हो रही है?

क्यों भारतीय रुपए की कीमत डॉलर की तुलना में कम हो रही है? 

आज दिनांक 16 मई 2022 की बात करें, तो एक डॉलर की कीमत भारतीय रुपए में 77.75 रुपए हैं। जबकि मार्च 2020 के  कोविड के समय ₹70 के आसपास थी। इसी तरह से 2013 में भी यह ₹70 की ऊंचाई को छुआ था जबकि और थोड़ा पीछे और जाते हैं तो 2010 में $1 की कीमत 45 भारतीय रुपए थी। 

वर्तमान में डॉलर की कीमत रुपए की तुलना में सबसे उच्चतम स्तर पर है। इसका आशय यह है कि रुपए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर हो रहा है। रुपए की तुलना में डॉलर मजबूत हो रही है। 

आइए इसे समझते हैं। ऐसा क्यों होता है? 

भारतीय रुपए और डॉलर के बीच के संबंध को केवल भारत के परिदृश्य में नहीं बल्कि पूरे विश्व की आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य में ही देखकर समझा जा सकता हैं। 

इसे समझने के लिए सबसे पहले यूएस डॉलर करेंसी इंडेक्स को समझना सबसे जरूरी है। 

यूएस डॉलर इंडेक्स 6 अंतर्राष्ट्रीय करेंसी की एक बास्केट का यूएस डॉलर के साथ तुलना है। इन 6 मुद्रा में यूरो, जापानी येन,  स्टर्लिंग पाउंड, कैनेडियन डॉलर, स्वीडिश क्रोना एवं स्विस फ्रैंक शामिल है। 

वर्तमान में यूएस डॉलर इंडेक्स भी अपने सबसे उच्चतम स्तर पर ट्रेड कर रहा है। फिलहाल यूएस डॉलर इंडेक्स 104.54 पर ट्रेड कर रहा है। 

रूस यूक्रेन युद्ध एवं उससे उत्पन्न  ऊर्जा संकट से पहले अर्थात 2022 के मार्च में यह $102 था जबकि 2021 के अप्रैल के समय यह $100 से नीचे। जबकि 2017 के जनवरी में $103 रहा है। 

जब 2008 में अमेरिकी बाजार में सब प्राइम संकट आया था तब या अपने निम्नतम स्तर पर था  $70 के आसपास।

अगर और पुराने इतिहास की बात करें तो 2000 से 2002 के बीच में जब डॉट कॉम बबल आया था और उससे मंदी (रिसेशन) उत्तपन्न हुई, एवं उस समय यह $120 के आसपास पहुंच गया था। 

 इन डाटा का निष्कर्ष क्या है? 

अगर इतिहास से शुरू करें तो डॉट कॉम बबल जब फूटा तो कई सारे देशों में खासकर वहां की आईटी सेक्टर में काफी बिकवाली (शेयर बाजार) आई, जिससे एक रिसेशन का वातावरण बना एवं उसी समय वर्ल्ड ट्रेड सेंटर(9/11)पर भी हमला हुआ था।

उस समय यूएस डॉलर करेंसी इंडेक्स $120 के पार चला गया। यूएस डॉलर इंडेक्स का ऊपर की ओर जाना, US डॉलर की मजबूती का संकेत है। जब भी इंडेक्स ऊपर की ओर जाता है तो डॉलर की तुलना में अन्य मुद्रा कमजोर होती है।  जब अन्य करेंसी मजबूत होती है तो इंडेक्स नीचे की ओर जाता है। 

डॉट कॉम बबल के बर्स्ट होने पर दुनिया के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा, और उन अर्थव्यवस्था की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था ज्यादा मजबूत रही। इसी तरह से जब कोविड-19 आया तब भी यही स्थिति देखी गई। डॉलर मजबूत हुआ तथा  अन्य करेंसी कमजोर हुई। 

क्यों ऐसा होता है कि जब दुनिया की अन्य देशों की अर्थव्यवस्था में समस्या दिखती है तो यूएस का  डॉलर मजबूत होता है?

इसे वैश्विक राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य से समझना पड़ेगा। 

यूनाइटेड स्टेट दुनिया की सबसे शक्तिशाली एवं सबसे स्थिर देश है, जहाँ ह्यूमन राइट्स , लोकतंत्र को अधिक महत्व दिया जाता है। यह विश्व की सबसे बड़ी सैन्य एवं आर्थिक महाशक्ति है। अंतरष्ट्रीय संस्थान जैसे World bank, IMF आदि पर इनका प्रभाव अधिक है। इन कारणों से यह माना जाता है कि US किसी भी संकट का सामना अन्य देशों की तुलना में बेहतर ढंग से कर सकती है। 

इसके अलावा दुनिया में जितने भी ट्रेड होते हैं, 90%  डॉलर में ही होते है। डॉलर एक तरह से इंटरनेशनल करेंसी की तरह काम करती है।

 क्यों डॉलर इंटरनेशनल करेंसी की तरह काम करती है? तो इसका एकमात्र जवाब है कि जिस देश की इकोनॉमी सबसे स्टेबल है,सबसे बड़ी है एवं जो देश सबसे शक्तिशाली है वहां की   अर्थव्यवस्था पर लोगों का विश्वास अधिक होता है और यह माना जाता है कि यह  करेंसी है और इस देश की  इकोनामी है बुरी से बुरी परिस्थितियों में दूसरे देशों की तुलना में अधिक बेहतर और कुशलता पूर्वक कार्य करेगी इसलिए लोगों / संस्थानों का भरोसा इनकी करेंसी पर अधिक होता है। 

इसलिए कहीं भी दुनिया में संकट आती है। तो डॉलर मजबूत होता है। 

इसको एक अन्य दृष्टिकोण से  समझते हैं। 

जब जब दुनिया के अन्य देशों में संकट होता है या विश्वव्यापी संकट आता है तब फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर यानी FII किसी देश में किए गए इन्वेस्टमेंट को वह निकालने लगती है।  जब वहां पर वह बिकवाली करेगी तो उस देश से डॉलर के रूप में निवेश निकल जाएगा। जिससे उस देश मे डॉलर की कमी होगी और डॉलर की कीमत बढ़ जाएगी।

जब 2020 में कोविड संकट आया है तो पूरे विश्व के शेयर मार्केट में सेलिंग देखी गयी।  जितनी ज्यादा सेलिंग होती गई,  डॉलर ऊपर की ओर आता गया और उस देश की करेंसी का वैल्यू कम होती गयी। 

यही स्थिति 2022 के मार्च से देखी गई है जब रसिया यूक्रेन वार शुरू हुआ और इस बार  साथ-साथ एक एनर्जी क्राइसिस भी उत्पन्न हो गई क्योंकि रूस पूरे यूरोप में पेट्रोलियम गैस का सप्लाई करता है। रूस पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट पर बैन लगा देने से पेट्रोलियम प्रोडक्ट की जो डिमांड है वह तो उतनी ही रही, लेकिन सप्लाई कम हो गई जिसके कारण क्रूड ऑयल की प्राइस बढ़ गया। जब क्रूड ऑयल की प्राइस बढ़ जाती है और जो देश क्रूड ऑयल के आयात पर ज्यादा निर्भर है, उनको अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, क्रूड ऑयल खरीदने के लिए, जिसे कारण उस देश की करेंसी की कीमत डॉलर के मुकाबले कम हो जाती है और डॉलर और मजबूत हो जाता है क्योंकि क्रूड ऑयल इंटरनेशनल बाजार में डॉलर से ही खरीदी जा सकती है।

जब अन्य देशों में रसिया यूक्रेन युद्ध का काफी नकारात्मक असर पड़ा, तब अमेरिका पर असर क्यों नहीं हुआ?

 इसका  सिंपल एक कारण है कि अमेरिका अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं है, एवं वह खुद पेट्रोलियम प्रोडक्ट का निर्यात करता है तथा इसके अलावा उसके अन्य energy resources है जो उनकी ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करने के लिए काफी है। 

 अगर भारत एवं यूरोप की बात करें तो वे अपने अधिकांश पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे इंपोर्ट करना पड़ता है।  मार्च 2022  से ठीक पहले  1 बैरल क्रूड ऑयल की कीमत $60 के आसपास थी जो अब एक $100 के से अधिक हो गई। जिसके कारण यूरोप के देशों एवं भारत को अधिक डॉलर खर्च करना पड़ रहा है और भारत एवं यूरोप से डॉलर की निकासी हो रही है जिसके कारण भारत और यूरोप में उसकी करेंसी का अवमूल्यन हो रहा है और वह करेंसी डॉलर की तुलना में सस्ती होती जा रही है। 

इसके अलावा एफआईआई  किसी भी देश के शेयर मार्केट से पैसा तब निकालते हैं जब यूएस में फेडरल रिजर्व अपनी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज की इंटरेस्ट रेट बढ़ाती है फिलहाल मार्च 2022 के बाद से यूएस गवर्नमेंट सिक्योरिटी के रेट में बढ़ोत्तरी हुई है। जिसके कारण debt asset class, equity asset class की तुलना में अधिक फायदेमंद लगने लगा है। जिसके फलस्वरूप भारत एवं अन्य देशों से एफआईआई ने शेयर बाजार में बिक़वाली कर उसे यूएस इकोनॉमी के गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में डाला जा रहा है। 

एफआईआई की सेलिंग के कारण बड़ी मात्रा में भारत एवं अन्य देशों से डॉलर बाहर निकला है। 

जिसके फलस्वरूप रुपए डॉलर की तुलना में गिरा है। इसी तरह यूरो भी अपने 5 साल के निम्नतम स्तर पर है। इसका भी वही कारण है  नेचुरल गैस की supply,  रूस यूक्रेन युद्ध एवं FII की बिकवाली। 

अमेरिका को एक इस चीज का भी फायदा पहुंचता है कि अमेरिका प्राकृतिक एवं राजनीतिक रूप से शत्रुओं से सीमा नहीं लगती है।  जिसके कारण वह एक तरह से विदेशी हमलों से  सुरक्षित है। 

इसके अलावा एनर्जी पर उसकी निर्भरता दूसरे देशों में नहीं है और उसकी अर्थव्यवस्था उच्च टेक्नोलॉजी पर निर्भर है जिसका कोई प्रतिस्पर्धी फ़िलहाल नहीं है। जर्मनी भी एक high-technology आधारित अर्थव्यवस्था है परंतु उसका साइज अमेरिका की तुलना में काफी कम है। एवं high tech आधारित अमेरिकी कंपनियों का एक तरह से एकाधिकार है विश्व बाजार में। 

इन सभी चीजों को मद्देनज़र रखते हुए जब कभी वैश्विक बुरी परिस्थितिया आती है  तब लोगों एवं संस्थानों  को अपने पैसे अमेरिका के बाजार में इन्वेस्ट करना या अमेरिका की गवर्नमेंट सिक्योरिटी में इन्वेस्ट करना ज्यादा  अच्छा, फायदेमंद एवं सुरक्षित लगता है इसलिए हमेशा से जब जब कोई भी क्राइसिस आती है तो अन्य देशों की करेंसी में बिकवाली आती है और डॉलर मजबूत होता जाता है।

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रविवार, 15 मई 2022

क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है?


भारत के संविधान के अनुसार हिंदी का उल्लेख आर्टिकल 343 में है, जिसमें यह कहा गया है  संघ (union) की ऑफिशियल लैंग्वेज अर्थात राजकाज की भाषा हिंदी होगी जो देवनागरी स्क्रिप्ट में लिखी जाएगी। 

साथ ही ऑफिशियल लैंग्वेज एक्ट 1963 के तहत हिंदी के साथ-साथ संघ के राज काज के लिए इंग्लिश को भी मान्यता दी गई है तथा केंद्र एवं अहिन्दी राज्य के बीच में कम्युनिकेशन के लिए इंग्लिश तथा हिंदी राज्यो के साथ हिंदी का प्रयोग का प्रावधान है। 

भारत के संविधान या भारत के कानून में ऐसा कहीं भी कुछ भी वर्णित नहीं है जिसमे हिंदी को पूरे राष्ट्र की भाषा के तौर पर मान्यता प्राप्त है। हिंदी केवल राजकाज की केंद्र की राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। 

साथ ही साथ प्रत्येक राज्य का अपना क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान  है जिससे वह अपना शासन कार्य उस भाषा में वह कर सकते हैं। वह भाषा हिंदी या हिंदी के अलावा अन्य भाषा हो सकती है। 

लेकिन समय-समय पर यह विवाद उठता रहता है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी को थोपा जा रहा है, या हिंदी को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है एवं  स्टॉप हिंदी इंपोजिशन जैसे कैंपेन सोशल मीडिया में चलाया जाता है। आइए देखते हैं इसमें क्या सच्चाई है? 

इस विवाद का मुख्य कारण लोगों की अज्ञानता है। उत्तर भरतीय लोग यह मानते हैं कि हिंदी पूरे देश की राष्ट्रभाषा है और सबको हिंदी आनी चाहिए। 

इसके अलावा दक्षिण भारत में खासकर तमिलनाडु में लोगों को यह भ्रम है कि हिंदी से तमिल भाषा का अस्तित्व और प्रयोग खतरे में पड़ जाएगी तथा उसकी भाषा की संस्कृति को नुकसान पहुंचेगा। 

उत्तर भारतीय लोगो का एक तर्क यह भी है कि उनकी भी मातृभाषा हिंदी नहीं है, किसी की अवधी है तो किसी की राजस्थानी, तो किसी की भोजपूरी तो किसी की अन्य कोई भाषा है, पर वो सभी हिंदी में एक दूसरे से बातचीत करते है। 
जब हिंदी का विरोध करने वाले और हिंदी का पुरजोर समर्थन करने वाले लोग कट्टर रुख अपनाते, तब विवाद उत्पन्न होता है। 

भारत एक बहुभाषी क्षेत्र है जहां पर हर 100 किलोमीटर में भाषा बदल जाती है। तो हमें हमेशा एक लिंक भाषा की जरूरत पड़ती है जिससे हम एक दूसरे से बात कर पाए, लेकिन वह भाषा क्या होनी चाहिए?

कुछ लोग यह मानते हैं कि लिंक भाषा हिंदी होनी चाहिए क्योंकि हिंदी सबसे अधिक क्षेत्रों में, सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। इसके अलावा कुछ लोग यह मानते हैं कि इंग्लिश होनी चाहिए ताकि किसी भारतीय भाषा का दूसरी भाषा पर प्रभुत्व ना हो। 

अगर भारत की वस्तुस्थिति देखी जाए तो दो भिन्न मातृभाषा वाले लगभग 70% लोगों द्वारा हिंदी का ही प्रयोग होता है तथा 10% से कम लोगो के द्वारा इंग्लिश का प्रयोग होता है। 
हिंदी से क्या फायदा और क्या नुकसान हो सकता है, इसे समझते हैं? 

हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।  हिंदी फिल्मों ने इसका प्रचार पूरे भारत में कर दिया है जिसके कारण अन्य भाषा के लोग भी हिंदी को समझने लगे हैं तथा बोलने भी लगे हैं एवं दो भिन्न भाषा वाले लोगो में कम्युनिकेशन के रूप में हिंदी का ही प्रयोग हो रहा है। 

हमें एक दूसरे से कम्युनिकेशन के लिए एक भाषा चाहिए जो फिलहाल भारत में हिंदी निभा रही है। 
एक लिंक लैंग्वेज नहीं होने पर कई सारी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है, रोजगार एवं आजीविका से इसका सीधा संबंध है। कम्युनिकेशन गैप की वजह से कई बार निर्दोष लोगों की हत्या तक हो जाती है। 

लेकिन क्या भारत में लिंक लैंग्वेज के रूप में  इंग्लिश का प्रयोग कर सकते है?

भारत में केवल 2% लोग ही हैं, इंग्लिश बोल पाते है। जिसके कारण कम्युनिकेशन में समस्या हो सकती है। हिंदी एवं अन्य उत्तर भारतीय भाषा की उत्तपत्ति संस्कृत से हुई है, जिस कारण हिंदी के  शब्द अन्य क्षेत्रीय भाषा जैसे गुजराती बांग्ला,असमिया आदि से काफी मिलते-जुलते हैं एवं बहुत सारे शब्द समान ही होते है। जिससे एक गुजराती को हिंदी सीखना ज्यादा आसान पड़ता है, उसी तरह से एक हिंदी भाषी के लिए गुजराती या मराठी सीखना कठिन नहीं है,  इसी तरह से एक बांग्ला या असमिया को हिंदी समझना एवं बोलना ज्यादा आसान पड़ता है,  इंग्लिश की तुलना में।  द्रविड़ भाषा समूह के भी बहुत सारे शब्द संस्कृत से लिए गए हैं। 

हिंदी पूरी तरह से भारतीय भाषा है लेकिन अंग्रेजों के 200 साल के शासन काल के कारण  इंग्लिश का प्रयोग भारत में  है साथ ही पूरे दुनिया में एक लिंक भाषा के रूप में इंग्लिश का प्रयोग किया जाता है। भारत में अधिकांश सरकारी काम, कोर्ट का काम भी इंग्लिश में होता है। इस कारण भारत में एक बड़ा समूह यह मानता है कि इंग्लिश को  लिंक भाषा के रूप में प्रयोग करना चाहिए। 

लेकिन हिंदी भाषा का एक बहुत बड़ा बाजार है। हिंदी भाषा के न्यूज़ चैनल, हिंदी भाषा के यूट्यूब वीडियो की पहुँच काफी अधिक होते हैं इंग्लिश भाषा की तुलना में। अगर भारत की बात की जाए तो तमिल भाषा की यूट्यूब वीडियो या इंग्लिश भाषा की यूट्यूब वीडियो की तुलना में  हिंदी भाषा की वीडियो की reach  अधिक होती है। जो जितना हिंदी से दूर होता है उसकी अपॉर्चुनिटी अन्य हिंदी जानने वालों लोगों की तुलना में कम हो जाती है। 

इसी तरह से कोई हिंदी भाषी अगर दक्षिण भारत के राज्य है या दूसरे अन्य हिंदीभाषी क्षेत्र में रह रहा है और वह उस क्षेत्रीय भाषा को नहीं जानता है तो उसके लिए भी समस्या रहती है। उसके लिए भी अपॉर्चुनिटी कम हो जाती है। 

इसका सबसे बड़ा सॉल्यूशन यह है कि भाषा लोगो को अपने जरूरत के अनुसार  सीखना एवं बोलना चाहिए। 

अगर कोई गैर तमिल तमिलनाडु सैलानी के तौर पर जाता है और वहां के लोग अगर ठीक से उससे communicate नहीं कर पाएंगे उसका अनुभव वह के टूरिज्म के प्रति खराब होगा जिससे वहाँ टूरिस्ट आना कम हो जाएंगे, अंतत उस राज्य को ही नुकसान होगा। यही बात दूसरे राज्य में भी कही जा सकती है। 

इसलिए! सबसे बेहतर या है कि आप जितनी अधिक भाषाओं को जाने उतना आपके लिए बेहतर है। भाषा सिखाने में जबरदस्ती नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को स्वेच्छा से अपनी जरूरत के हिसाब से भाषा सीखना चाहिए। जो जितनी अधिक भाषाएं जानेगा उतना  फायदे की स्थिति में रहेगा।

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शुक्रवार, 13 मई 2022

क्या भारत श्री लंका जैसी स्थिति की और बढ़ रहा है?

 कुछ लोग यह मान रहे हैं कि भारत श्रीलंका जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है। क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है?
आइये इसे समझते हैं। 

अगर वर्तमान समय की बात की जाए तो श्री लंका की स्थिति चिंताजनक है वहां उत्पन्न आर्थिक संकट अब राजनीतिक संकट एवं गृह युद्ध की ओर बढ़ चुका है। भारत समेत कई विदेशी संगठन श्रीलंका की मदद कर रहे है। परंतु इस आर्थिक संकट से उबरने में श्रीलंका को काफी समय लगेगा।

किस तरह की संकट का सामना श्री लंका अभी कर रहा है?
 श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम हो चुका है जिसके कारण वह अपनी जरूरत की वस्तुओं का आयात नहीं कर पा रहा है। इस स्थिति के कारण श्री लंका अनाज एवं पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की गंभीर कमी का सामना कर रहा है। वहाँ के पेट्रोल पंपों में लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं।  घर में खाना बनाने के  एलपीजी गैस की कमी हो चुकी है,अब लोग लकड़ी का प्रयोग खाना बनाने में कर रहे है। यही स्थिति बिजली तथा अन्य जरूरत के सामानों की है। 

श्रीलंका में यह संकट अचानक नहीं आया बल्कि यह काफी लंबे समय से गलत आर्थिक नीति का परिणाम है। श्रीलंका के कई बड़े निवेश प्रोजेक्ट  चीन के द्वारा दिए गए ऋण से किये गए, परन्तु उस प्रोजेक्ट से उनकी कोई आय नहीं बढ़ी और वह चीन के ऋण जाल में फंसता गया। उस ऋण के व्याज का भुगतान उसके सीमित विदेशी मुद्रा से होने लगा।

2020 के कोविड संकट से वहाँ के टूरिज्म इंडस्ट्री को काफी धक्का पहुंचा, जिसके कारण उसके विदेशी मुद्रा भंडार में काफी कमी आई।  साथ ही साथ 2014-15 में शुरू की गई जैविक खेती, जिसमें रासायनिक खादों का प्रयोग बंद कर दिया गया, जिससे अनाजों के उत्पादन में काफी कमी आई और खाद्य पदार्थो के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ गयी। 

इन्ही कारणों की वजह से वहां पर वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम हो गया और पेमेंट सप्लाई की समस्या उत्पन्न हुई, और वह पेट्रोलियम गुड्स के साथ अनाज के आयात करने में असमर्थ हो गया और इन वस्तुओं की भारी कमी हो गयी।

श्रीलंका की यह स्थिति विश्व में कोई नई नहीं है, बल्कि कई देश पहले भी गलत आर्थिक नीतियों के कारण इस स्थिति का सामना कर चुके है। भारत भी 1990 में इस स्थिति का सामना कर चुका है।  वर्तमान में कई देश अभी भी इस तरह की स्थिति का सामना कर  रहे है। फिलहाल नेपाल ने भुगतान संकट के कारण गैर जरूरी आयात को कम किया है। 

कोविड-19 के कारण अमेरिका अपने अप्रत्याशित खर्च को पाटने के लिए अत्यधिक मात्रा में डॉलर की प्रिंटिंग की और उसे खुले बाजार में डाल दिया, जिससे वैश्विक महंगाई उत्पन्न हुई, क्योंकि अमेरिकी डॉलर अघोषित रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में कार्य करता है। इस महंगाई के आग में घी डालने का काम रसिया यूक्रेन वार ने किया। 

महंगाई के कारण जो देश आयात पर अधिक निर्भर है और जिसकी आय कम है, उनकी आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। 

यह आर्थिक संकट कई देशों में दिख रहा है। अगर स्थिति ठीक नहीं हुई तो श्रीलंका जैसी स्थिति और कई देशों में भी हो सकती है। लेकिन क्या  भारत में भी ऐसी स्थितियां हो सकती है? 

इसे समझने के लिए हमें भारत की भुगतान संतुलन को समझना होगा। 

भारत में गुड्स का आयात, निर्यात से अधिक है और इस trade deficit के कारण जितनी विदेशी मुद्रा भारत आती है,उससे ज्यादा बाहर जाती है। फिर भी भारत में भुगतान संकट संकट नहीं है। 

 इसका सबसे बड़ा कारण है वो भारतीय जो भारत से बाहर रहते है और वहाँ से बड़ी मात्रा में रेमिटेंस भारत भेजते हैं। इसके अलावा FDI एवं FII के रूप में एक बड़ी मात्रा में धन हर साल भारत में आ रहा है। 

विदेशी मुद्रा (डॉलर) भारत लाने में टूरिज्म और सर्विस का एक्सपोर्ट भी एक बड़ी भूमिका निभाता है जिसके कारण हम लोगों का भुगतान संकट 1990 के बाद कभी पैदा नहीं हुआ एवं लगातार डॉलर रिजर्व बढ़ता जा रहा है। 

वर्तमान में की स्थिति की बात करें तो भारत में भी महंगाई बढ़ती जा रही है। महंगाई का सबसे बड़ा कारण अंतरास्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों एवं खाद्य तेलों का कीमत बढ़ना है। 

रूस - यूक्रेन युद्ध के कारण यूक्रेन से गेहूं एवं सूर्यमुखी के तेल की सप्लाई बंद हो गयी। चूंकि भारत खाद्य तेल का net importer है, इसलिए यहाँ खाद्य तेल की कीमत काफी बढ़ गयी। साथ ही वैश्विक बाजार में गेहूं की सप्लाई भारत से होने के कारण भारत में   आटे की कीमत में 15% की वृद्धि हुई है। इस सभी कारणों के कारण भारत में महंगाई अपने रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन 75% परिवारों को खाद्य सुरक्षा में काफी कम कीमत पर खाद्य सामग्री देने के कारण महंगाई की मार से आम जनता को थोड़ी राहत है।

इन सभी स्थितियों के बावजूद भी भारत में भुगतान संकट या फॉरेन रिजर्व में कमी जैसी स्थिति नहीं दिखती है। भारत के पास जितना रिजर्व है उससे इस तरह के कई संकटों का सामना कई सालों तक वह आसानी से कर सकता है। साथ ही भारत GDP विकास दर भी विश्व में सबसे अधिक है। हाँ महंगाई के कारण जनता पर बोझ बढ़ा है लेकिन जब विश्व में परिचालित डॉलर के अनुपात में वैश्विक GDP समान हो जाएगी तब ही महंगाई कम हो पाएगी। 


शनिवार, 11 सितंबर 2021

अफगानिस्तान क्या अविजित रहा है हमेशा से?

9/11 की घटना के 20 साल हो चुके है। इस घटना के बाद जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान पर हमला शुरू किया, तब कुछ लोग यह कहते थे कि जिस तरह रूस को हार का सामना करना पड़ा उस तरह अमेरिका को भी हार मिलेगी, अफगानिस्तान को कोई गुलाम नहीं बना पाया है। 

आज जब अमेरिका अफगानिस्तान छोड़ कर चला गया, तब भी लोग यही कह रहे है। 

वास्तविकता देखी जाय तो इस नरेटिव के काफी उलट है। अमेरिका कभी वहाँ कब्जा करने के उद्देश्य से नहीं आया था, उसे अलकायदा और उसके सहयोगियों से बदला लेना था, जो उसने ले लिया। हालांकि उसने कोशिश की एक उदारवादी लोकतंत्र बनाने की अफगानिस्तान में, जिसमें वे सफल नहीं रहे। 

औपनिवेशिक युग से दुनिया काफी आगे निकल चुकी है। अब किसी देश में कब्जा करके कोई देश अमीर नहीं बन सकता है, अगर उस देश में बहुमूल्य संसाधन ना हो। अफगानिस्तान में ना ही कोई तेल भंडार है और ना ही अन्य कोई संसाधन और ना ही कौशल युक्त मानव संसाधन, किसी देश को उसे कब्जा करने में कोई लाभ नही है। अब वैसे भी 20% उत्पादन क्षमता के साथ अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, और तेल का net exporter है। तेल वाली कहानी, जिसमें यह कहा जाता रहा है कि अमेरिका तेल के कारण पश्चिमी एशिया में लड़ाई  झगड़े करवाता है, बेमानी हो चुकी है। वैसे भी अब clean Energy का समय है।

वैसे भी अमेरिका को पैसे के लिए किसी देश में कब्जे या हथियार बेचने के लिए लड़ाई झगड़े करवाने की जरूरत नही है। अमेरिका के FAANG (Facebook, Apple, Amazon, Netflix, Google) जैसी कंपनियां पूरे विश्व से पैसा लाकर अमेरीका को और अमीर बनाती जा रही है।

अब रह गई अफगानिस्तान की बात तो इतिहास के बहुत कम समय में ही अफगानियों का अफगानिस्तान में हुकूमत रही, यूनानी, ईरानी, तुर्क, तेमुरिद, मंगोल, अरबी, सिख आदि ने लंबे समय तक अफगानिस्तान में राज किया, अफगानियों की एक मात्र सफलता भारत में रही, जहाँ कुछ समय तक राज किया, लेकिन तेमुरिद-मुगल के आ जाने से वो सत्ता से दूर चले गए।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

जातिगत सर्वश्रेष्ठता का भाव और उसके मायने


क्रिकेटर सुरेश रैना द्वारा खुद को ब्राह्मण बताने और रविंद्र जडेजा द्वारा खुद को राजपूत बताने पर उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आलोचक कह रहे है कि ये लोग जातिवाद और वर्ण व्यवस्था को महिमामंडित कर रहे है। 

सैकड़ो सालो से जातिव्यवस्था और वर्ण व्यवस्था चली आ रही है, पहले यह व्यवस्था कर्म आधारित थी, फिर धीरे धीरे जन्म आधारित होने लगी, फिर धीरे धीरे यह व्यवस्था उच्च जाति-निम्न जाति के भेदभाव और निम्न जाति के सामाजिक, आर्थिक शोषण का साधन बन गयी। जाति और वर्ण के आधार पर  निम्न मान कर लोगो से अमानवीय व्यवहार तक किया जाने लगा था। पर आज़ादी के बाद जाति आधारित और वर्ण आधारित भेदभाव काफी कम हुए है, परन्तु समाप्त नहीं हुए है। अभी भी कई बार जाति आधारित भेदभाव के मामले  देखने मिलते है।

भारत में लोगो को कई आधार पर खुद को दुसरो से ऊपर या सर्वश्रेष्ठ दिखाने की प्रवृति पाई जाती है।  यह प्रवृति मुख्यत: जाति आधारित, धर्म आधारित, क्षेत्र आधारित होती है|  लोगो को लगता है कि वे केवल इसलिए सर्वश्रेष्ठ है कि वो फलाने जाति, या पंथ या क्षेत्र के है।  लोग अपने सोशल मीडिया profile में भी लिखते है, proud hindu, proud Muslim, जय राजपुताना, गर्व से कहो कि हम बिहारी है, गर्व करो कि हम बनिए है…... यहाँ केवल जाति के आधार पर खुद को सर्वश्रेष्ठ नहीं दिखाया जाता है, बल्कि रंग, रूप, आवाज, शरीर की बनावट आदि के आधार पर भी खुद को दुसरो से बेहतर समझते है।

इस तरह का भाव केवल भारत में नहीं बल्कि पश्चिमी देशो में भी रहा है। 100 साल पहले तक यूरोपियनो को भी लगता था कि उनकी नस्ल इस पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ है, तथा उनका कर्तव्य है कि अन्य नस्लों पर शासन करे। वो अन्य इंसानो को इंसान ना मान कर जानवरो जैसा सलूक करते थे। दासप्रथा इसका सबसे अच्छा उदहारण है, जहाँ मनुष्यों की खरीद बिक्री होती थी, दासो के साथ जानवरो से बदतर सलूक किया जाता था। 

वस्तुत: लोग अपने फायदे के अनुसार अपना सोच रखते है, उन्हें सर्वश्रेष्ठता का भाव ख़ुशी देता है। एक कम पढ़ा लिखा उच्च जाति का व्यक्ति अपने से अधिक पढ़ा लिखा निम्न जाति के व्यक्ति से खुद को सर्वश्रेष्ठ समझ कर खुश होता रहता है। इसी तरह के भाव अन्य आधार पर भी लोग रखते है।

परन्तु इस तरह के सर्वश्रेष्ठता के भाव से समस्या क्या है?

वैसे देखा जाय तो फिलहाल भारत में कोई समस्या नहीं है, सभी लोग एक जैसा नहीं सोच सकते है। लोग अपने विवेक अनुसार सोचते है, जिसमें जितना अधिक विवेक होता है, उनकी सोच और व्यवहार उतना ही अधिक बेहतर होता है। कोई अपने आप को सबसे सर्वश्रेष्ठ समझ सकता है, कोई खुद को भगवान भी समझ सकता है, इसमें अन्य व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता है। अन्य लोग स्वयं  को क्या समझते है, यह हमारी समस्या नहीं है, समस्या तब उत्त्पन्न होती है, जब दुसरो के सोच के आधार पर हम स्वयं को ऊँचा या नीचा समझने लगते है। 

अब समय काफी बदल चुका है, बिना किसी गुण के सर्वश्रेष्ठता का भाव का कोई मायने नहीं है। कर्म और ज्ञान के आधार पर काबिलियत की ही कद्र है।

रविंद्र जडेजा या सुरेश रैना आपने आप को क्या समझते है, उससे हमें या अन्य लोगो को कोई नुकसान नहीं पहुँच सकता है| हमें नुकसान तब हो सकता है, जब हम स्वयं को नीचा समझने लगे और उस आधार पर व्यवहार करने लगे। वस्तुत: उनके केवल खुद को ब्राह्मण या राजपूत कहने पर प्रतिक्रिया देना या विरोध करना तर्कसंगत नहीं है, यहाँ तक की रविंद्र जडेजा के तलवार चलाने के पोस्ट पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देना समझ से परे है। केवल जातीय पहचान बताना या खुद को अपने जाति या धर्म से जोड़ना सर्वश्रेष्ठता दिखाना नहीं कहा जा सकता है। रविन्द्र जडेजा और सुरेश रैना को देश सम्मान उसके जति के आधार पर नहीं बल्कि उसके क्रिकेट खेलने के कौशल के आधार पर देता है। 

वैसे गर्व और सर्वश्रेष्ठता की संकल्पना (concept) बहुत ही छिछले आधार पर टिका है| इंसानो को लगता है कि वो इस पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ रचना है, सभी जानवर और अन्य सभी वस्तुए उनकी उपभोग के लिए है, कई रिलिजन में भी यह संकल्पना है, जिसमे उस रिलिजन को मानने वाले को सर्वश्रेष्ठ और अन्यो को कमतर माना जाता है, यहाँ तक कई संकल्पना में पुरुष अपने आप को महिला से सर्वश्रेष्ठ मानते है, और उन्हें केवल उपभोग की वस्तु समझते है| इसलिए जब इस तरह के सोच पुरे समुदाय पर हावी हो जाती है,  तब हमें इस सोच की वास्तविक समस्या दिखती है| हिटलर के समय Jewish holocaust तथा अफगानिस्तान में तालिबान के शासन में महिलाओ पर अत्याचार, नस्लीय तथा लैंगिक सर्वश्रेष्ठता जैसी सोच का ही नतीजा है।

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शुक्रवार, 18 जून 2021

क्या हर प्रतिबंधों से आजादी संभव है? Is freedom from all restrictions possible?


क्या ऐसा संभव है कि हम इंसानों पर किसी भी प्रकार का कोई भी प्रतिबंध ना हो, क्या पूर्ण आजादी कहीं दिखती है? क्या कोई इंसान हमें ऐसा दिखता है जिस पर किसी का भी जोर नहीं चलता है एवं वह अपने अनुसार अपना जीवन यापन करता है?


हम लोग में से अधिकांश लोग हमेशा से यह चाहते हैं कि हम लोगों पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध या रोक ना हो।  हम लोग वस्तुतः एक मुक्त जीवन की कामना करते हैं, एक  ऐसा मुक्त जीवन  जो किसी को शायद ही मिला  हो, पर हमारी इच्छा कई बार इस तरह की जीवन जीने की जरूर होती है। 


सामाजिक जीवन में हमेशा इस बात की चर्चा होती रही है कि हमें कितनी आजादी मिलनी चाहिए, हम पर कितना प्रतिबंध होना चाहिए, आदि। इसी को ध्यान में रखते हुए समाज, परिवार के नियम, धर्म,  देश के  कानून आदि बनाए गए हैं।  यह नियम और कानून हमें कई सारी आजादी देती है तथा कई जगह हमारी आजादी को छीनती है या कम करती है। कई जगह हमारे पर सकारात्मक प्रतिबंध लगाती है और कई जगह हमें नकारात्मक स्वतंत्रता भी देने का कोशिश करती है। हर उम्र के लोगों पर, हर प्रकार के सामाजिक- आर्थिक  ताने-बाने के लोगों पर सदियों से नियम या कानून लागू किया गया है। परंतु यह भी पाते हैं कि कहीं भी, किसी भी काल में कोई एक ऐसी एक समान व्यवस्था, स्वतंत्रता देने की या स्वतंत्रता छीनने की नहीं हो पाई है।  समय एवं काल के अनुसार इसके स्वरूप लगातार बदलते रहे हैं।  वर्तमान में भी बदल रहे हैं, और ऐसी उम्मीद है कि भविष्य में भी एवं अलग-अलग स्थानों में भी बदलते रहेंगे।  क्यों ऐसा होता है कि हम सभी इंसान या निश्चय नहीं कर पाते हैं कि हमें किस प्रकार की आजादी मिलनी चाहिए, हम पर किस प्रकार का प्रतिबंध होना चाहिए, क्यों इतनी  विविधता है समय एवं काल के अनुरूप?


हमें स्वतंत्रता देने वाले या प्रतिबंध लगाने वाले नियम-कानून, लोगों के स्थान एवं काल के अनुसार उपजी सामूहिक  मानसिकता के आधार पर उनको मिलती रही है।  जैसा समाज होगा, जैसा उनकी सोच होगी, या जिस तरह के लोग की उस समाज में प्रभाविता  रहेगी, उस प्रकार के नियम-कानून पूरे समाज के सभी लोगों पर लागू किए जाएंगे।  एक तरह से देखा जाए तो यह collective conscience प्रतीत होता है। 


मनुष्य का इतिहास को देखा जाए तो पाषाण काल या उससे पहले से ही यह चीज समझ में आ गई कि समूह में रहकर की वह अपने से काफी बड़े-बड़े शक्तिशाली जानवरों को मार सकता है या उसे पा लतू बना सकता है, इसलिए उस समय से ही मानव  बस्तियों में रहने लगे, जिससे उसकी जान माल की सुरक्षा अच्छे से होने लगी। 
लेकिन क्या कभी आपने या हमने सोचा है कि उस समय अगर कोई मनुष्य समूह से हटकर अकेला जीवन यापन करे तो क्या-क्या समस्याएं उत्पन्न हो सकती है उसे। देखा जाए तो जीवन जीने के लिए केवल भोजन ही काफी नहीं है, हमें अन्य चीजों की भी जरूरत पड़ती है। अकेले रहने की तुलना में समूह के साथ रहने में हमारी बहुत सारी आवश्यकताओं का आसानी से पूर्ति हो जाती है। जिस कारण अकेले रहने की तुलना में मनुष्य समूह में रहना ज्यादा पसंद करता है। 


अगर हम वर्तमान समय की बात करें भी आदि काल से चली आ रही समूह में रहने की मनुष्य की व्यवस्था से कुछ अलग नहीं है।  आज भी हमें परिवार, नाते- रिश्तेदार, मित्रों की जरूरत पड़ती रहती है जब हम बच्चे थे, तब माता-पिता की जरूरत होती है, जब हम बूढ़े  होते हैं अपने बच्चों की जरूरत पड़ती है।  मानसिक तनाव के समय प्यार से सांत्वना देने वाले जीवनसाथी की  जरूरत होती है। जब हम खुश होते है तब भी हमें खुशियां बांटने के लिए साथी की जरूरत होती है। 


क्या स्वतंत्रता या प्रतिबंध, दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तिगत लागू पड़ती है? इस पर बात की जाए तो, अमेरिका के राष्ट्रपति, विश्व की सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन क्या वह भी हर समय अपनी मनमर्जी का कर सकते हैं? क्या उस पर कोई प्रतिबंध का लागू होना बेमानी प्रतीत होती है? अगर इसे आप गहराई से देखे तो अमेरिका का राष्ट्रपति भी कई सारी प्रतिबंधों से युक्त है।  वह ऐसा कदम नहीं उठा सकता है जो वहाँ की अधिकांश जनता की सोच के विपरीत हो, चाहे उस पर कितना भी विश्वास या इच्छा क्यों ना हो। अगर वह जनता की इच्छा के विपरीत कदम उठाने लगेगा तो अगले चुनाव में जनता उसे राष्ट्रपति के पद से जनता हटा सकती है, फिर वह आम नागरिक की तरह रह जाएगा। 


 अगर बात की जाए तो किसी एक भारतीय परिवार में कमाने वाले पुरुष की,  क्या वह  किसी प्रतिबंधों से युक्त नहीं है? क्या वह अपनी मर्जी से हर कुछ कर सकता है? तो यहां भी यह पाते हैं कि वह भी कई प्रकार के प्रतिबंधों से युक्त है, उसे भी परिवार के नियम का पालन करना पड़ता है अगर वह अपने परिवार को साथ लेकर नहीं चलता है, तो परिवार वाले भी को उनका त्याग कर सकते हैं। 


 हम अपने समाज में देखते हैं कि कई साधु- संत जो अपने परिवार को छोड़कर विचरण करते रहते हैं, तो क्या वह पूर्ण रुप से स्वतंत्र हैं और किसी पर निर्भर नहीं है? क्या उस पर कोई कानून या प्रतिबंध लागू नहीं पड़ता है? यहां पर भी या कहा जा सकता है कि  वह अपने जीवन यापन के लिए दूसरों के दान पर निर्भर है, तथा उस पर भी समाज के तथा देश के कानून लागू पड़ते है।  वह भी जब बीमार पड़ता है, तो डॉक्टर की शरण में जाता है। 


महान दार्शनिक रूसो का कहते है कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सदा जंजीरों में जकड़ा रहता है,  हर कथन हर का ल एवं स्थान के लिए उपयुक्त जान पड़ता है।


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शनिवार, 12 जून 2021

ट्विटर : अभिव्यक्ति की आजादी या अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध Twitter : Freedom of expression or restriction on expression

 एक माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म जो शायद विश्व का सबसे बड़ा है, लगभग  सभी राजनेता, महत्वपूर्ण हस्ती, सेलिब्रिटी ट्विटर पर है।  यहां उनके फॉलोअर्स से पहचान होती है, कि कौन कितना प्रभावी है।  बीते कुछ सालों में टि्वटर एक काफी शक्तिशाली प्लेटफॉर्म बन चुका है। 


हाल के कुछ समय में ट्विटर काफी विवादों में रहा है, जिसका मुख्य कारण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप & कंगना राणावत का टि्वटर अकाउंट स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया, इसी प्रकार नाइजीरिया के राष्ट्रपति एक टि्वट डिलीट कर दिया गया, इसी तरह के और वाक्ये  में देखा जाए तो भारत सरकार के बहुत सारे मंत्रियों के ट्विटर पर मेनूप्लेटेड मीडिया (manipulated media)  का टैग लगा दिया गया था। 


कई देशों ने ट्विटर पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है,  कई देशों में ट्विटर प्रतिबंधित भी है।  जब भी कोई देश ट्यूटर पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध या रेगुलेशन की बात करता है तो हमेशा यह बात उठती है कि अभिव्यक्ति की आजादी को छीना जा रहा ह। 


 अभिव्यक्ति की आजादी क्या है? अगर इसका साधारण अर्थ लिया जाए तो अपने आप को किसी भी प्रकार से अभिव्यक्त करने की आजादी मानी जाती है, पर क्या यह  पूरे विश्व में एक समान है? क्या हर समाज में अभिव्यक्ति की आजादी उतना ही है? क्या हर विषय पर कभी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की आजादी एक समान की जा सकती है? क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई भी प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है? मनुष्य को हर तरह की चीजें को अभिव्यक्त करने का, बोलने का अधिकार मिलना चाहिए, चाहे उससे कितना भी नुकसान क्यों ना हो?


वैसे अधिकांश देशों में अभिव्यक्ति की आजादी absolute (बिना किसी प्रतिबंध के) नहीं है हर जगह कुछ ना कुछ प्रतिबंध अवश्य है, कहीं अधिक है कहीं कम है,  हर दृष्टि से देखा जाए तो  अभिव्यक्ति की आजादी बिना प्रतिबंधों के नहीं हो सकती है।  अगर पूर्ण रूप से अभिव्यक्ति की आजादी मिल जाए तो पूरे समाज एवं देश में अस्थिरता का माहौल उत्पन्न हो जाएगा एवं अशान्ति छा जाएगी। 


 हम जब भी कुछ बोलते हैं, तो यह जरुर सोचते हैं कि सामने वाला व्यक्ति को कैसा लगेगा, अच्छा लगेगा या उस बात से दुखी होगा, उसे  खुशी मिलेगी या  वह निराश होगा या वो  परेशान होगा।  हम हमेशा कोशिश करते हैं कि कम से कम इस तरह की बातें की जाए जिससे सामने वाले  व्यक्ति को कष्ट ना हो। अधिकांश लोग अपने जीवन में हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोग करते आए हैं कि सामने वाला, जिसे अपना संदेश दे रहा हूं उसे कोई समस्या में ना आए और तकलीफ ना हो। 


इस तरह से हम हमेशा यह कोशिश करते हैं कि सामने वाली व्यक्ति जिसको हमारा संदेश जा रहा है वह किस तरह से उस पर प्रतिक्रिया(react) करता है।  उसी तरह से हमें ट्विटर पर भी कुछ भी ट्वीट करने से पहले या ध्यान रखना चाहिए कि इसका पूरे समाज पर क्या असर पड़ेगा, किसी एक व्यक्ति को बोलने की तुलना में ट्विटर पर ट्वीट करना अधिक जिम्मेदारी पूर्ण होना चाहिए, क्योंकि यह काफी बड़े समूह एवं हर प्रकार के लोगों तक आपके संदेश को पहुंचाता है।  टि्वटर अपने आप को अभिव्यक्त करना किसी एक व्यक्ति को अपना संदेश देना या कुछ बातें कहने से काफी बड़ी चीज है।  इसलिए ट्विटर पर अपने आप को अभिव्यक्त करने से पहले हम लोगों को काफी कुछ चीजों का ध्यान रखना अति आवश्यक है यहां कुछ भी अभिव्यक्त करने की आजादी काफी खतरनाक हो सकती है। 



इस  विषय पर चर्चा में कई प्रश्न उभर कर आते है, जैसे -


क्या कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जो लाभ के लिए सोशल साइट चलाती है, वह पूर्ण रुप से निष्पक्ष होने के दावा पर खरी उतर सकती है? क्या market-oriented व्यवहार एक बड़े मार्केट से प्रभावित नहीं हो सकता है एवं एक बड़े समुह को प्रभावित नहीं कर सकता है?


क्या ट्वीटर न्यायपालिका की तरह यह निर्णय कर सकती है कि कौन सी ट्वीट अभिव्यक्ति की आजादी के अनुसार है और कौन सा ट्वीट उसके विपरीत, और यह निर्णय कर सकती है कि किस की अभिव्यक्ति की आजादी को अपने platform से अनुमति प्रदान करे और किसकी नहीं?


 क्या एक समान अभिव्यक्ति का अधिकार पूरे विश्व में लागू की जा सकती है?


 क्या मशीन के द्वारा, कुछ कीवर्ड्स को स्कैन कर करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी एवं उनके प्रतिबंध को सुनिश्चित की जा सकती है?


 क्या कुछ एक जैसे सोचने वाले लोगों के समूह पर प्रतिबंध एवं उसके विपरीत सोचने वाले समूह का समर्थन कर उस देश के लोगों की भावना, उनके विचार,  चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका आदि को क्या प्रभावित नहीं किया जा सकता है?


 इस तरह के कई और  प्रश्न उठते है, जिनके जवाब दिए जाने चाहिए जो हमेशा से यह बातें करते  है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी भी प्रकार का कोई भी प्रतिबंध  नहीं होना चाहिए। और इस पर भी जवाब दिए जाने चाहिए कि क्यों  इस अभिव्यक्ति की आजादी से पैसे कमाने वाली प्राइवेट कंपनी पर किसी भी सरकार का कोई भी कानून लागू नहीं होना चाहिए। 


 जहां तक मेरा मानना है की अभिव्यक्ति की आजादी absolute नहीं है, यह कुछ प्रतिबंधों के साथ आती है, जो भारत के संविधान के अनुसार है।  कोई भी संस्था या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जिस देश में कार्य करती है, उस देश के नियमों का पालन अवश्य ही करना चाहिए।  उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का मापदंड उस देश की के संविधान की अभिव्यक्ति की आजादी के मापदंड के समान होना चाहिए ना कि उसके विपरीत।  इस प्रकार के social media platform पर एक नियामक संस्थान (Regulatory body) अवश्य होनी चाहिए जो यह सुनिश्चित करें, कि उस संस्था द्वारा देश के कानून का पालन करे, एवं यह भी देखे की उस platform  के द्वारा किसी समूह या व्यक्ति विशेष का समर्थन या प्रतिबंध का उस देश की लोगों की भावनाओं, उनके विचार, वहां की चुनाव प्रणाली, वहां के न्यायपालिका एवं अन्य चीजों पर क्या असर पड़ता है।


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शुक्रवार, 11 जून 2021

क्यों देखनी चाहिए The Family Man II series?

  

   अगर 2 शब्दों में कहें तो केवल और केवल मनोज बाजपेई एवं सामंथा अक्किनेनी के शानदार अभिनय के लिए देखनी चाहिए। 

    लेकिन इसकी उत्कृष्टता केवल अभिनय तक सीमित नहीं है, इसकी पटकथा भी उतनी ही शानदार एवं जानदार  है। कहानी कसी हुई हैं एवं शुरू से अंत तक बांधे रखती है। इसके डायलॉग, अभिनय एवं पटकथा के साथ बखूबी मेल खाते हैं तथा या ब्लैक कॉमेडी का एक शानदार नमूना प्रस्तुत करती है।

 

    यह सीरीज बीते कुछ समय की सबसे बेहतरीन सीरीज के रूप में उभरी है, इसे निर्देशित Raj & D.K. ने किया है। इसके निर्देशन में गजब का कसावट है, जिससे यह सीरीज में कहीं भी धीमी नहीं पड़ती है, जिससे दर्शकों को बोर होने का मौका ही नहीं मिलता है। हर नया एपिसोड पहले से ज्यादा रोमांचित करता है, तथा जल्द से जल्द सभी एपिसोड देखने पर मजबूर करता है। 


    मनोज बाजपेई एवं समांथा अक्कीनेनी के अलावा अन्य सभी सहायक  कलाकार 

अपने अभिनय से एक अपनी एक अलग पहचान छोड़ते हैं एवं  सीरीज को शानदार बनाने में अपना योगदान देते हैं। प्रत्येक किरदार अपने जीवंत अभिनय से अपने छोटे-छोटे रोल को यादगार बना देते हैं।

 

    अगर बैकग्राउंड म्यूजिक की बात की जाए तो यह कहानी के अनुरूप प्रतीत होते हैं इसके निर्देशन में बारीक से बारीक चीजों का भी ध्यान रखा गया है, जैसे - सीसीटीवी कैमरा की  मौजूदगी,  श्रीलंकन तमिल बोलने की शैली आदि । 


 यह  सीरीज अमेज़न प्राइम में प्रदर्शित की जा रही है जिसे दर्शकों का काफी बेहतरीन रिस्पॉन्स मिला है। लेकिन अधिकांश सीरीजो की तरफ यह भी कुछ विवादों में रहा है जैसे लिट्टे के दिखाए जाने के कारण उसके समर्थकों द्वारा विरोध, लव जिहाद को दिखाए जाने का विरोध आदि प्रमुख है।  परंतु  पूरी सीरीज देखने से उनके विरोध काफी सतही प्रतीत होते है। 


 अभी तक यह  सीरीज डिजिटल ब्लॉकबस्टर साबित हो चुकी है और लोकप्रियता एवं उत्कृष्टता में  इससे  पहले वाली सीरीज को काफी पीछे छोड़ चुकी है।  इसमें कोशिश की गई है कि ऐसी कोई भी विषय वस्तु ना हो जो इसे विवाद का कारण बने। यहा एक बैलेंसड अप्रोच रखा गया है। जहां  वर्तमान के सभी सीरीज  उत्तर भारत को केंद्र में रखकर बनाई जा रही है वहीं इसका अप्रोच दक्षिण भारत एवं Pan India है। इसे जरूर देखनी चाहिए। 


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गुरुवार, 10 जून 2021

क्यों करते है वट सावित्री की पूजा ? Why do we worship Vat Savitri?

 


क्यों करते है इस पूजा को जानने से पहले यह जानते है क्या होता है इस पूजा में। वट सावित्री की पूजा हिन्दू मास ज्येष्ठ  माह के अमावस्या के दिन मनाया जाता है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में इसी ज्येष्ठ माह के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन वट वृक्ष का पूजन कर सावित्री-सत्यवान की कथा को याद किया जाता है। 


शादीशुदा महिलाएं सुबह जल्दी उठ कर, स्नान आदि कर स्वच्छ हो कर लाल या पीले वस्त्र धारण कर विभिन्न पूजा सामग्री से वट वृक्ष की पूजा करती है, तथा जल चढ़ाती है, फिर इसके बाद वट वृक्ष के तने के चारों कच्चा धागा लपेट कर तीन या सात बार वृक्ष की परिक्रमा करती है। 


हिन्दू मन्यताओ में वट वृक्ष को पूजनीय माना जाता है एवं इसमे देवी - देवताओ का वास माना जाता है। इसलिए वट वृक्ष की पूजा करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है ऐसा माना जाता है। 


ऐसी मान्यता है कि इस दिन सावित्री अपने मृत पति को जीवित करवाने के लिए यमराज से याचना की थी, जिससे प्रसन्न होकर यमराज ने उसके पति सत्यवानके प्राण लौटा दिए थे। 


 वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा


भद्र देश के राजा अश्वपति को संतान के लिए सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत एवं पूजन करने के पश्चात  एक पुत्री की प्राप्ति हुई  जिसका नाम सावित्री रखा गया।  सावित्री के युवा होने  पर उसके लिए वर तलाशने  लगे।  लेकिन काफी खोजने पर भी  नहीं मिलने की वजह से सावित्री के पिता ने उन्हे स्वयं वर तलाशने के लिए कहा। 


जब सावित्री तपोवन में विचरण कर रही थी,तब उस समय वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने उसे पति के रूप में उनका वरण कर लिया। 


जब ऋषि नारद हो या पता चला  तो उसने राजा अश्वपति को बताया सत्यवान जरूर विवेकशील, बलवान एवं योग्य  है, परंतु उसकी आयु छोटी है, शादी के कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। 


नारद की यह बात सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए, जब सावित्री ने उनसे चिंता का कारण पूछा तो उसने बताया कि तुमने जिसे  पति के रूप में चुना है, वह अल्पायु है, इसलिए  तुम्हें किसी दूसरे से शादी करनी चाहिए।  इस पर सावित्री ने कहा कि वह सत्यवान को अपने पति के रूप में वरण  कर चुकी है एवं हठ  करने लगी और कहीं कि मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी।  सावित्री के हठ के कारण राजा ने सावित्री का विवाह  सत्यवान से कर दिया।

 

 शादी के बाद सावित्री अपने ससुराल आ गई और उसने नारद मुनि के कहे अनुसार अपने पति की आयु के लिए  पूजन एवं उपवास करने लगी। 


हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन लकड़ी काटने जंगल गया था एवं साथ में सावित्री भी गई थी।  जंगल में पहुंच कर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए पेड़ पर चढ़ा एवं तभी ही उसके सर पर तेज दर्द होने लगा।  दर्द से जब से व्याकुल होकर सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गया, उसी समय  सावित्री समझ चुकी थी कि वह समय अब आ गया है। वह उसके सर को गोद में रखकर उसका सर सहलाने लगी। 


जब यमराज सत्यवान को अपने साथ ले जाने लगा तो सावित्री भी उसके  पीछे पीछे चल पड़ी। यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की, और कहा कि यह विधि का विधान है लेकिन सावित्री नहीं मानी। 


 सावित्री की निष्ठा एवं पति परायणता को देखकर यमराज ने उससे वर मांगने को कहा। सावित्री ने सबसे पहले अपने अंधे सास ससुर के लिए ज्योति  मांगी।  यमराज ने कहा ऐसा ही होगा, जाओ अब लौट जाओ।  परंतु सावित्री पुनः अपने पति सत्यवान के पीछे पीछे चलती रही, यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ, परंतु सावित्री ने कहा भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है, पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है।  यह सुनकर यमराज ने उसे एक और वर मांगने को कहा। 


 सावित्री बोली कि हमारे ससुर का राज्य छीन गया है आप उसे  दिला दे।  यमराज ने यह वरदान भी उसे दे दिया और सावित्री को रुकने के लिए कहा परंतु सावित्री पीछे पीछे चलती रही।  इसके बाद यमराज ने पुनः सावित्री से एक और वर मांगने को कहा, तब सावित्री ने 100  संतान एवं सौभाग्य का वर मांगा और यमराज ने यह  वरदान भी सावित्री को दे दिया। 


 इसके बा यमराज उसके पति की को लेकर जाने लगे एवं जब यमराज ने पुनः  पीछे मुड़ कर देखा तो पाया कि  सावित्री भी पीछे आ रही थी।  तो यमराज ने कहा मैंने सभी वर  तुम्हें दे चुका हूं अब आप वापस चले जाओ। तब  सावित्री ने कहा प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूँ और आपने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है अतः मुझे मेरा पति लौटा दिया जाए।  यमराज इसके बाद निरुत्तर हो गए, एवं सावित्री की पतिव्रता से प्रसन्न  प्रश्न होकर सत्यवान  को छोड़कर अंतर्धान हो गए। इसके बाद सावित्री उस पेड़ के पास जाती है और देखती है की उसके पति को होश आ चुका है। जब वह अपनी पति के साथ घर जाती है तो पाती है कि  उसके सास ससुर की दृष्टि वापस या चुकी है।


                                     


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रविवार, 6 जून 2021

क्यों करना चाहिए हमें शेयर मार्केट में (निवेश) Invest ?

 


शेयर मार्केट
कोई जुआ नहीं है, ये साधारण व्यापार है।  अगर आप स्वयं से कोई कंपनी बनाकर चला नहीं सकते हैं तब आप अपनी मनपसंद कंपनी के शेयर खरीद कर उस कंपनी के शेयर होल्डर बन सकते हैं। अगर आपकी कंपनी लाभ कमाती है या भविष्य मेँ उस कंपनी के business काफी बढ़ने की संभावना है, तो आपके स्टॉक के मूल्य बढ़ेंगे और जब उस स्टॉक को बेचेंगे तब आप लाभ कमाएंगे, और यदि आपकी कंपनी को हानि होता है, तो आपके स्टॉक के मूल्य घट भी सकते है।

 

जब भी किसी कंपनी को अपने कारोबार को और अधिक बढ़ाने के लिए अधिक धन की जरूरत होती है, तो वो कंपनी एक निश्चित मूल्य पर share स्टॉक मार्केट में जारी करती है, जिसे आम जनता या कोई भी संस्था खरीदती है। इससे share जारी करने वाले कंपनी को अपने कारोबार बढ़ाने के लिए धन मिल जाता है। फिर उस share के मांग एवं आपूर्ति के आधार पर उसके मूल्य घटने बढ़ते रहते है।

 

 जहां बैंक या पोस्ट ऑफिस में रिटर्न 6 से 7 प्रतिशत होता है, वही स्टॉक मार्केट शेयर मार्केट में रिटर्न काफी ज्यादा हो सकता है।

 

अंदाजन हर साल महंगाई 5 से 10% बढ़ जाती है, जिस कारण पोस्ट ऑफिस या या बैंक से मिलने वाले रिटर्न का लाभ महंगाई मेँ adjust हो जाता है।

 

 इन्वेस्टमेंट और अच्छे रिटर्न के कई अन्य तरीके भी है, जिसमे उत्तर भारत में real estate मेँ, वही दक्षिण भारत मे सोना मेँ investment मेँ ज़ोर रहता है। सोना को तुरंत enchase किया जा सकता है, लेकिन सोना की सुरक्षा हमेशा से चिंता का विषय रहा है। जबकि real estate को monetize करने मे समय लगता है तथा इसके खरीद बिक्री मेँ कई सारी अन्य समस्याए भी आती है। अन्य तरीको मेँ Mutual Fund वर्तमान मेँ काफी लोकप्रिय है, जिसमेँ Fund Manager स्टॉक मार्केट को अच्छे से analysis कर कई सारे स्टॉक मेँ इन्वेस्ट करते है।

 

भारत में करीब करीब 2 से 2.5 करोड़ के आसपास लोग स्टॉक मार्केट में ट्रेडिंग या investment करते है। यह कुल आबादी का करीब 2% है, जबकि USA में 55% वयस्क स्टॉक मार्केट के द्वारा इनवेस्टमेंट करते है।

 

स्टॉक मार्केट मेँ इनवेस्टमेंट से पूर्व हमें कई विषयो की जानकारी आवश्यक है, जैसे किस कंपनी के share खरीदनी है, कब खरीदनी है, कब बेचनी है। जिसे उतनी जानकारी नहीं है या जिनके पास समय नहीं है, वो विशेषज्ञो की सलाह के आधार पर इनवेस्टमेंट कर सकते है।

 

स्टॉक मार्केट में लाभ- हानि पूरी अर्थव्यवस्था, या किसी विशेष इंडस्ट्री के performance, share के चुनाव और किस समय में किए इनवेस्टमेंट पर निर्भर करता है। आपकी समझ, ज्ञान, जागरूकता आपके लाभ या हानि को घटा या बढ़ा सकता है।

 

स्टॉक की खरीद विक्री के लिए NSE और BSE भारत की सबसे बड़ी सरकारी संस्थान है, तथा इनके नियमन के लिए SEBI है। शेयरो की ट्रेडिंग Broker के द्वारा होती है, जिसे SEBI license देती है। किसी भी व्यक्ति तो शेयरो की खरीद विक्री के लिए एक Demat Account होना जरूरी है। Demat Account मेँ ही खरीदे गए स्टॉक की पूरी जानकारी रहती है। फिलहाल सभी प्रकार की ट्रेडिंग ऑनलाइन एवं real time मे होती है। जिसकी सूचना व्यक्ति हो real time मेँ ही पता चल जाता है। 

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सोमवार, 3 अगस्त 2020

रक्षाबन्धन क्यों मनाते है?




हम सभी यह जानते है कि यह भाई - बहन का  त्यौहार है, जहां बहन, भाई के हाथ में राखी बांधती है, और भाई उसकी रक्षा करने वचन देता है। पर क्या इतिहास है इसका?

रक्षाबंधन श्रावण महीने के पुर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसके बारे में यह कहा जाता रहा है कि मुगलकाल से यह प्रचलन आया है, यह न केवल भ्रामक है, बल्कि इतिहास तो तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने जैसा है।

हिन्दू धर्म के कोई भी अनुष्ठान होते है, उसमे रक्षा सूत्र बाँधा जाता है, जो साधारण धागा होता है। इसे बांधते समय कर्मकांड करने वाले पंडित एक श्लोक का उच्चारण करते है, इस श्लोक का संबंध राजा बलि से है।

भविष्य पुराण के अनुसार देवगुरु वृहस्पति ने इंद्र के हाथ में रक्षा सूत्र बांधते हुए निम्न श्लोक का वाचन किया :-

येन बद्धों बलीरजा दानवेन्द्रो महाबल:।

तेन त्वमापि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।

इस श्लोक का हिन्दी अर्थ है :

 “जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे( राखी) ! तुम अडिग रहना”।

जिस दिन रक्षा सूत्र बांधा गया, वह दिन श्रावणी पुर्णिमा था और देव- दानव युद्ध में देवो की विजय हुई। रक्षा सूत्र के कारण विजय होने की धारणा के कारण उसी दिन से यह प्रथा चली आ रही है।

इतिहास में द्रौपदी और श्री कृष्ण की कहानी भी प्रसिद्ध है। शिशुपाल वध के समय जब श्रीकृष्ण की उंगली चोटिल हो जाती है, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा उसकी उंगली में बांध दी थी, इस उपकार के बदले, श्री कृष्ण ने उसे आजीवन रक्षा करने का वचन दिया था, जिसे श्रीकृष्ण ने चीरहरण के समय द्रौपदी की साड़ी बढ़ा कर उसकी रक्षा की थी।

इसके अलावा इस त्यौहार से संबन्धित राजा बलि, यमराज और यमुना की कहानी प्रसिद्ध है। महाभारत के कई सारे प्रसंगो में रक्षा बंधन जैसे पर्व का उल्लेख है।

यह ब्राह्मणो का सबसे बड़ा  त्यौहार माना जाता है, ब्राह्मण पुराने जनेऊ (यज्ञोपवीत) का त्याग कर नए जनेऊ धारण करते है, तथा पुरोहित अपने यजमानो को धागा बांधते है, उनकी सुख शांति एवं बाधा रहित जीवन की प्रार्थना करते है और बदले में दान प्राप्त करते है।

हिन्दुवों के अलावा जैन धर्म में भी रक्षाबंधन मनाया जाता है। जैन साहित्य के अनुसार इसी दिन विष्णुकुमार नामक मुनिराज ने 700 जैन मुनियो की रक्षा की थी। उसके बाद से जैन भी इस  त्यौहार मनाने लगे और विश्वशांति की प्रार्थना करते है।

इसके ऐतिहासिक प्रसंगो की बात की जाय तो जब भी राजस्थान के आस पास के योद्धा युद्ध के लिए जाते थे, तब महिलाए उनके माथे पर कुमकुम, तिलक लगाने के साथ हाथ मे रेशमी धागा बांधती थी और विजयी होकर लौटने की प्रार्थना करती थी।

समय के साथ साथ रक्षाबंधन  त्यौहार मनाने के नियमो में परिवर्तन होने लगे। धार्मिक त्यौहार धीरे धीरे सामाजिक एवं सांस्कृतिक त्यौहार में बदलने लगा। इसे हर धर्म समप्रदाय के लोग मनाने लगे। जिससे स्वरूप काफी बदला है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव, इस पर्व का भावनात्मक होना रहा है, जिसके चलते भी इसका प्रसार सभी वर्गो में हुआ और अन्य सभी धर्मो में इसकी स्वीकार्यता बढ़ी।



एक धार्मिक त्यौहार का भावनात्मक बदलाव ने इस त्यौहार पर काफी प्रभाव डाला और इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गयी। धीरे- धीरे इसमे स्त्री पुरुष का भेद आने लगा। वर्तमान स्वरूप में महिला अपने भाई को राखी बांधती है, और भाई उसे हर समय मदद का वचन देता है। यहाँ राखी बांधने वाला और बँधवाने वाला में स्पष्ट रूप से लिंग (gender) का निर्धारण है।

इस भावनात्मक बदलाव का सबसे बड़ा कारण काल रहा। मध्यकाल में स्त्रियो की सामाजिक स्थिति निम्नतर होती गयी और सुरक्षा एवं अन्य जरूरी साधनो के लिए पुरुष पर निर्भरता बढ़ती गयी। जिससे इस त्यौहार का स्वरूप बदल गया।

आधुनिक काल में भी यही स्थिति बनी रही। मीडिया, फिल्मी गानो ने इस भावना को और बढ़ाया, जिससे यह स्थिति स्थापित हो गयी, कि रक्षाबंधन का अर्थ है कि बहन, भाई को राखी बांधेगी और भाई उसकी रक्षा करने का वचन देगा।

वर्तमान समय में जहां महिलाए हर क्षेत्र में पुरुषो से कदम से कदम मिला कर चल रही है, अब यह स्थिति है कि बहन भी भाई की हर तरह से रक्षा कर सकती है। लेकिन इस त्यौहार को तर्क के आधार पर ना देख कर इसकी भावना के आधार पर देखना चाहिए। यह पर्व भाई- बहन के प्यार को और बढ़ाता है, साथ ही साथ सांप्रदायिक सौहार्द को भी स्थापित करता है। यह पर्व सभी के चेहरो में खुशिया लाता है। हम सब इसका साल भर काफी वेसब्री से इंतजार करते है।

सभी को रक्षा बंधन की शुभकमनाए।